सोमवार, 30 सितंबर 2013

हर चाहत हो जाये पूरी ये जरुरी तो नहीं

विनय कुमार शुक्ल


कहते है लोग अक्सर मत हो तुम परेशान कभी
हर चीज को तुम हल्के में लो सभी
अगर हर चीज को हल्के में ले पाता कोई
तो दुनिया में गम को ढूँढ पाता कोई
सुख दुःख तो जीवन की कथा है
इसी में हम सबकी व्यथा है
खुशी कौन इस जहाँ में नहीं है चाहता ?
पर हर चाहत हो जाये पूरी ये जरुरी तो नहीं|

चाहत तो होती है सभी की यही
हो जाये चाहत अपनी सदा के लिए
हो जाती है चाहत यूँ कभी कभी पूरी
पर हर चाहत हो जाये पूरी ये जरुरी तो नहीं ,
पर हर चाहत हो जाये पूरी ये जरुरी तो नहीं |

( लेखक  भौतिक विज्ञान विभाग में शोध छात्र हैं )

बेशक्ल भटकता ख़्वाब

 -नितिन धाकड़
                                                                  
नामुमकिन सा था
उन राहों से मुकर जाना
जिन पर तुम्हारे निशाँ थे,
और उस ढलती शाम को
यूं  सह जाना अकेले
भी कहाँ आसाँ था ?

तुम्हारे आने से पहले भी आता था कोई
मेरे ख़्वाबों की गुमनाम दुनिया में,
मेरी कल्पनाओं के गाड़े रंगों में,
एक धुंधला सा चेहरा,
दबे पाऊँ चला आता
मरहम लगाने हर ज़ख्म पर |
हर सवेर अब तो एक ख्वाइश थी,
वो सूरत, वो आकृति,
वो तस्वीर साफ़ हो जाए,
मेरे भटकते ख्वाब को काश
कोई शक्ल मिल जाए |

फिर एक भौर तले तुम्हें देखा,
उस ऊँचे झरोखे से संसार ताकते |
तुम्हारा चेहरा मानों आईना था,
या शायद प्रतिबिम्ब,   
मेरे पलकों में दबे उस चेहरे का |
और अब तो हर कीमत अदा कर  
तुम्हें पा लेने की
मेरी अज्ञात ख्वाइशों को
यों कैद रख लेना मन में ही,
आसाँ तो नहीं था |

हर सवेरा अब तो
कशमकश के साथ दस्तक देता
और हर रात ख्वाबों में तुम,
सरगम अब तो छिड़ी थी फिज़ा में,
पत्तों की सरसराहट में,
लहरों के टकराव में,
मासूम की किलकारी में
और उस बेबात सन्नाटे में भी,
अब तो तराने सजते थे |
थिरकते मेरे इन कदमों को
यों थाम लेना तेरी और बढनें से भी
तो कहाँ आसाँ था ?

वक़्त की रफ़्तार अब मेरी थी,
और वो वक़्त ही तो था जिसके संग
तुम अब निगाहों के सामने थी
पर कहाँ तुम्हारा अस्तित्व
हकीक़त लग रहा था,
चेहरा तो हूबहू था
पर कहाँ हाथों में जख्मों का मर्ज़ था,
तुम छलावा थी मेरी आभासी दुनिया का
तुम्हें यों सच मान
फिर से झुठला देना भी तो
कहाँ आसाँ था ?

तुम्हें ढूंढ लेने की कोशिशों में
मैंने खुद खो दिया
अब इन जाने पहचाने अनजाने चेहरों
में खोज लेना मेरी शक्ल का ‘मैं’
आसाँ तो नहीं था |
अब तो एक अनसुलझी पहेली,
नींद में निकली एक चीख,
बेढंग फैली लाल स्याही के नीचे
दबी एक कहानी,
खुद से ही अजनबी मैं और
फिर एक बेशक्ल भटकता ख्वाब
आँखें मूँद इसे फिर पलकों में सजा लेना

इतना आसाँ तो नहीं था |

( लेखक आई आई टी रुड़की में द्वितीय वर्ष के छात्र हैं )

रविवार, 29 सितंबर 2013

मैं हूँ...

-अंकित मोदी 
मैं हूँ ,मैं हूँ गुजरते लम्हों में भी,मैं हूँ गुजरे हुए लम्हों में भी |
आज में मैं चहकता हूँ,कल की खुशबू  में महकता भी हूँ |
कुछ हिस्सा मेरा अभी साथ है मेरे,कुछ हिस्सा छूटा पास है तेरे |
कुछ ज़र्रे मेरे तो मुझ मे बाकी हैं अभी,कुछ यादों में रह गए तन्हा तभी |

कभी खुद को समझता हूँ, कभी खुद को उड्धेलता हूँ,कुछ कम सा लगता हूँ कल से, जब खुद को टटोलता हूँ |
है कुछ तो मेरा कल में छूटा,हुआ कुछ तो है जो मैं अब हूँ टूटा |क्या है, क्यूँ है,  बेखबर बेपता,ये क्यूँ हुआ की मैं खुद से रूठा |
मैं हूँ अभी या था तभी,
खो
जाता हूँ कभी कभी |धुमिल लम्हों के सायें में, सो लेता हूँ जब कभी,तो फिर उन सपनो के फलक से,उस नींद की गिरफ्त से,चाहता हूँ बाहर आऊँ, पर हारता हूँ जब कभी,तो फिर बस वही कल हूँ चाहता,खुद का खुद से मेरा वही राबता,नहीं है कोई आसमानी ख्वाहिशें ,बस मैं, मेरा कल और जो खुद से साथ था |
( लेखक वरिष्ठ स्नातक छात्र हैं )