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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

जन्माष्टमी स्पेशल





  (चित्र http://iyadav.com से साभार ) 


हे योगेश्वर! आ जाओ, अब भक्त पुकारें तुम्हारें,
कलयुग है, प्रासंगिक हैं सारे सन्देश तुम्हारें|

मालूम है तुम इसमें, उसमें, मुझमें, सबमें,
फिर भी आओ, दरश दिखाओ,
अब भी भूखे सोते कई सुदामा,
बहुत राधिका व्याकुल,
ओ आओ किशन कन्हैया,
बंशी धुन सुनने को ये सारी दुनिया आकुल|
हे योगेश्वर! आ जाओ......

बहुत पुकारें द्रौपदी अब भी,
शहर-शहर अब गली-गली निर्लज्ज दुशासन|
ओ जाओ अर्जुन के संगी, पांचाली के भैया
अब सहा नहीं जा सकता हमसे,
दुर्योधन का अन्यायी कुशासन|
हे योगेश्वर! आ जाओ......

अब भी अर्जुन वापिस बाण डालता तरकस में,
सारे भीष्म, द्रोण का चेतन कुण्ठित,
द्वारिका पुनः मांगती राजा तुमसा,
दुनिया को गीता का फिरसे गीता का ज्ञान सुना जाओ,
अर्जुन को पुनः जगा जाओ, भारत को पुनः सजा जाओ|
हे योगेश्वर! आ जाओ......

बुधवार, 13 अगस्त 2014

उसके अपहरण की कविता




















(चित्र http://www.topart168.com से साभार ) 

मैं जब भी सोचता हूँ
अपनी सबसे अच्छी शाम के बारे में
वो होती है
मेरे बिस्तर की तरह
पूरी खुली हुई
और मैं दिला रहा होता हूँ
अपने आप को इस बात का भरोसा
कि मेरा शिकंजा ढीला नहीं है|

मैं जब भी सोचता हूँ
अपनी सबसे अच्छी रात के बारे में
पढ़ते हुए मार्केज़ को या फ़िर साहिर को
नींद आकर पसर जाती है  
वो किताब को मुझसे ले जाती है
और फ़िर बंद कर देती है रौशनी का स्विच |

मैं जब भी सोचता हूँ
अपनी सबसे अच्छी सुबह के बारे में
वो उठ चुकी होती है
और मेरी नींद टूटती है
किचन की खटपट से
लेकिन वो सामने होती है
पल्लू कमर में खोसे
मुस्कान के साथ
पैरों तले कुचल गए कीड़े की
बिलबिलाहट-सी मुस्कान के साथ
मेरा ध्यान सिर्फ़ प्याले पर होता है |

मैं जब भी सोचता हूँ
अपने सबसे अच्छे दिन के बारे में
लंचबॉक्स में कोफ्ते होते हैं
अपनी उँगलियों को चाटते समय लेकिन
मुझे उसकी उंगलियाँ नहीं याद आतीं |
ये भी नहीं कि
वो क्या कर रही होगी इस समय
वहाँ
जहाँ मैं उसे रखकर भूल गया
बहुत पहले |

पता नहीं क्यों
आज मन किया
ढूँढने का
उससे बात करने का
और ये सब कुछ
बदल कर लिख डालने का
जैसे
सबसे अच्छी रात में
मैं नींद तोड़कर उठा
और मैंने चूम लिए  
उसके सुस्ताते हुए होंठ |

बस मन किया
लिख लिया
क्या किया ?

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

‘टूटी रेलिंग’

- निशांत
 ( चित्र http://flickrhivemind.net से साभार)

जैसे कोई शब्द
कौंधता है
अचानक
कुछ कविताएँ लिख जाती हैं
बस इतने भर में |
वो भी कौंधी
इसी तरह
अपने छज्जे की
टूटी रेलिंग के सहारे
न जाने कितनी कविताएँ लिए !

सोमवार, 11 अगस्त 2014

मैं अपने कमरे पर ही रहता हूँ...

- आयुष्मान


 ( चित्र swmindia.blogspot.com से साभार)


मैं अपने कमरे पर ही रहता हूँ
हाँ! खिड़की से ज़रूर देखा है
सड़क के किनारों पर कुछ पेड़ लगे हैं
छोटे ही हैं अभी
लाल हरी बैरीकेडिंग में घेर के रखे गए हैं
कुछ गायें अक्सर उनके आस पास गर्दन लम्बी करती रहती हैं
उधर एक समोसे की दूकान है
जिसके बगल में कूड़े का ढेर के बीच एक बड़ा सा डब्बा दबा है
जिस पर नगर निगम जैसा कुछ लिखा हुआ है
उसमे कुत्ते शायद कुछ ढूंढा करते हैं
यूँ तो उन्हें कभी कुछ मिलता नहीं
पर कभी कभी वो पीठ पर बोरी टांग कर आते हैं
और उसी ढेर में से कुछ कुछ उठाकर बोरी में भर लिया करते हैं |
कूड़े की ढेर से निराश हो के कुत्ते समोसे की दुकान पर
थालियों के पास खड़े दुम हिलाया करते हैं
और टुकड़ा फेकने पर खा लेते हैं
पर वो दो पैरों वाले 'कुत्ते'....
पहले तो आधा नहीं पर पूरा समोसा देने पर खा लेते थे
आज कल कुछ काग़ज़ के टुकड़े मांगते हैं|
सामने बिजले के तारों पर
इस पेड़ से उस पेड़ गिलहरियाँ छुप-छुप कर भागती हैं
डरती होंगी शायद ये सब देख के
मैं भी बहुत डरता हूँ,
पर एक दीवार है मेरी
मुझे बचा कर रखती है |
उस पर कुछ अजीब-अजीब सी चीजें लिख रखी हैं मैंने
वहीँ बगल में मेरा बिस्तर लगा है
सामने मेज़ पर कुछ काग़ज़ बिखरे रहते हैं
बाकी उन पर लिख देता हूँ,
पर मैं बाहर नहीं निकलता
मैं अपने कमरे पर ही रहता हूँ|