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मंगलवार, 19 अगस्त 2014

जन्माष्टमी स्पेशल





  (चित्र http://iyadav.com से साभार ) 


हे योगेश्वर! आ जाओ, अब भक्त पुकारें तुम्हारें,
कलयुग है, प्रासंगिक हैं सारे सन्देश तुम्हारें|

मालूम है तुम इसमें, उसमें, मुझमें, सबमें,
फिर भी आओ, दरश दिखाओ,
अब भी भूखे सोते कई सुदामा,
बहुत राधिका व्याकुल,
ओ आओ किशन कन्हैया,
बंशी धुन सुनने को ये सारी दुनिया आकुल|
हे योगेश्वर! आ जाओ......

बहुत पुकारें द्रौपदी अब भी,
शहर-शहर अब गली-गली निर्लज्ज दुशासन|
ओ जाओ अर्जुन के संगी, पांचाली के भैया
अब सहा नहीं जा सकता हमसे,
दुर्योधन का अन्यायी कुशासन|
हे योगेश्वर! आ जाओ......

अब भी अर्जुन वापिस बाण डालता तरकस में,
सारे भीष्म, द्रोण का चेतन कुण्ठित,
द्वारिका पुनः मांगती राजा तुमसा,
दुनिया को गीता का फिरसे गीता का ज्ञान सुना जाओ,
अर्जुन को पुनः जगा जाओ, भारत को पुनः सजा जाओ|
हे योगेश्वर! आ जाओ......

शनिवार, 21 जून 2014

"कैसे हो तुम "

              

- रवि मीना


 


















कैसे हो तुम? बहुत दिनों से कोई सन्देश नहीं आया है,

बहुत लिखे ख़त मैंनें ही खुद, पर उत्तर अब तक नहीं पाया है|

आँखे राहे तक-तक थक गई,

दिल की धड़कन धक-धक कर गई,

अब खुद ही निकला हूँ पैदल तुम्हें ढूँढने,

पर अब तक तेरा देश नहीं आया है|

कैसे हो तुम.....


वहां बैठे-बैठे दिल में कुछ अरमान उड़े थे,

अरमां वो आपस में मिलजुल बादल बन बैठे|

प्रेम की कोई हवा चलाकर वो बदल तुम तक पहुंचाएं हैं|

बदल बरसे तो हैं पर ठंडी पवन के झोंके,

अभी मुझ तक नहीं आये हैं|  
                          
कैसे हो तुम? बहुत दिनों से कोई सन्देश नहीं आया है,

बहुत लिखे ख़त मैंनें ही खुद, पर उत्तर अब तक नहीं पाया है|



(रवि आई.आई.टी. कानपुर में द्वितीय वर्ष के छात्र हैं )

शुक्रवार, 21 मार्च 2014

पल दो पल आँख मिला जाना


(चित्र- द वर्ल्ड अपसाइड डाउन, इस्राहेल वान मेक्केनेम द्वारा)
रस्ते में जाते देखा था 
खिड़की से तुमको,
सोचा था मुझसे मिलने 
आज चली आई हो,
होकर पागल ख़ुशी-ख़ुशी में, 
मैनें सांकल खोल दिया था,
आज तलक नहीं आई तुम, 
पर दिल का द्वार खुला है अब तक,
आ जाओ, मिलना मत, 
बस दरवाजे को बाहर की तरफ लगा जाना,
बातें मत करना चाहे, 
बस पल दो पल आँख मिला जाना|

पंखे के नीचे लहराती तेरी 
चुन्नी को जब-जब देखा था,
तब-तब भूल विषय कक्षा का 
तुम पर नज़र गड़ा ली,
सखियों के संग आँखें झुकी होने पर भी 
कोई बात सुना डाली,
मालूम है बहुत बुरा लगता था तुमको ये सब,
तो आ जाओ इस अपराधी को 
कुछ सजा सुना जाना,
बातें मत करना चाहे, 
बस पल दो पल आँख मिला जाना|

बहुत की थी कोशिश मैंने तो 
तेरा नंबर पाने की,
तुमने सब पर रोक लगा डाली 
बस दस अक्षर बतलाने की,
मजबूरी में ख़त लिख डाले 
इच्छा जो थी धड़कन को बतलाने की,
आज तलक मैं भेज ना पाया, 
शंका थी किसी और के हाथ लगाने की,
अब वो पीले-पन्ने कमरे में उड़ते हैं 
इधर-उधर, आकर पढ़ जाना,
बातें मत करना चाहे, 
बस पल दो पल आँख मिला जाना|

सोमवार, 13 जनवरी 2014

कुछ सपने


- रवि मीणा 














कुछ स्वप्न अभी भी अनदेखे,
कुछ लक्ष्य अभी भी आधे हैं,
बहुत जटिल है दुनियादारी,
हम तो सीधे-साधे हैं,
कुछ कहते हैं,
मत विस्तार करो, पछताओगे,


देखा तो पाया-
सब के सब कच्चे धागे हैं;
मैं गड्ढ़े से धरती पर आया हूँ,
अम्बर में उड़ना चाहता हूँ|

मैं मेंढक सा ज्ञानी हूँ,
आकाश बराबर
ज्ञान जुटाना चाहता हूँ|
कुछ कहते हैं,
मत उछलो, गिर जाओगे,
देखा तो पाया,
सब मनमौजी
गिरते-पड़ते साकी हैं,
कुछ स्वप्न अभी भी अनदेखे,
कुछ लक्ष्य अभी भी बाकी हैं|

(लेखक आई आई टी कानपुर में द्वितीय वर्ष के छात्र हैं)