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रविवार, 17 अगस्त 2014

अमृतलाल नागर जो कभी नहीं मरे

" प्रेमचंद के उत्तराधिकारी के तौर पर टैग किया जाना कुछ हद तक उनकी क्षमताओं को एक दायरे में सीमित मान लेने जैसा है जबकि वो उस दायरे से कहीं ज्यादा बड़ी परिधि खींचते हैं। "






अमृतलाल नागर ने बहुत कुछ लिखा। अगर हम श्रेणियों में बांटें यानि क्लासिफाई करें तो उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, जीवनी, नाटक, रेडियो नाटक, रिपोर्ताज, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि गद्य में लगभग सब कुछ लिखा। और सिर्फ़ साहित्य नहीं बल्कि सिनेमा में भी उन्होंने महत्वपूर्ण फिल्मों के संवाद और पटकथा ( डायलॉग और स्क्रीनप्ले ) लिखे, जैसे कल्पना (१९४६), संगम (१९४१), और बहूरानी (१९४१)। साहित्य अकादमी, प्रेमचंद पुरस्कार, और सोवियत संघ नेहरू पुरस्कार आदि से उनके लेखन को सम्मानित किया गया है।
अपने समय के बहुत से अन्य लेखकों की तरह ही उनके लेखन में भी प्रमुख विषय वही हैं - सामाजिक बंधनों के प्रति विद्रोह, प्रशासकों के द्वारा उत्पीड़न, ज़मींदारों-व्यापारियों द्वारा जनता का शोषण, साम्प्रदायिकतावादियों की कुटिल चालें आदि। लेकिन उनका कला तत्त्व अन्य सभी लेखकों के कला तत्त्व से अलग दिखाई देता है। 

मैंने उनकी पहली बार जो कहानी पढ़ी थी वो थी 'प्रायश्चित '। यक़ीनन आप में से भी बहुतों ने पढ़ी होगी और उसके कथ्य को समझा भी होगा। समाज के व्यर्थ स्टीरियोटाइप को भंग करती ये कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि उनके समय में थी। विशेष तौर पर नारी के प्रति जिस मध्यकालीन (feudal) सोच को हम अभी भी अपने समाज में पनपा रहे हैं ये कहानी उसको तहस-नहश कर देती है। जिन्होंने नहीं पढ़ी वो जरूर पढ़ें और मुझे लगता है जिन्होंने पढ़ रखी है वो भी एक बार फ़िर से पढ़ना चाहेंगे। ये रही कहानी -

प्रायश्चित 

 

जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश भक्त एवं समाज-भक्त भी बनते हैं, तथा अपने ख़ून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता है, तथा इसी आयु में मनुष्य विलासी, लोलुपी और व्यभिचारी भी बन जाता है, और इस प्रकार अपने जीवन को दो कौड़ी का बनाकर पतन के खड्ड में गिर जाता है, अंत में पछताता है, प्रायश्चित करता है, परंतु प्रत्यंचा से निकाला हुआ बाण फिर वापस नहीं लौटता, खोई हुई सच्ची शांति फिर कहीं नहीं मिलती।



मणिधर सुन्दर युवक था। उसके (जेब) पर्स में पैसा था और पास में था नवीन उमंगों से पूरित हृदय। वह भोला-भाला सुशील युवक था। बेचारा सीधे मार्ग पर जा रहा था, यारों ने भटका दिया—दीन को पथ-हीन कर दिया। उसे नित्य-प्रति कोठों की सैर कराई, नई-नई परियों की बाकीं झाकी दिखाई। उसके उच्चविचारों का उसकी महत्वकाक्षांओं का अत्यन्त निर्दयता के साथ गला घोंट डाला गया। बनावटी रूप के बाज़ार ने बेचारे मणिधर को भरमा दिया। पिता से पैसा मांगता था वह, अनाथालयों में चन्दा देने के बहाने और उसे आंखें बंद कर बहाता था, गंदी नालियों में, पाप की सरिता में, घृणित वेश्यालयों में।



ऐसी निराली थी उसकी लीला। पंडित जी वृद्ध थे। अनेक कन्याओं के शिक्षक थे। वात्सल्य प्रेम के अवतार थे। किसी भी बालिका के घर खाली हाथ न जाते थे। मिठाई, फल, किताब, नोटबुक आदि कुछ न कुछ ले कर ही जाते थे तथा नित्यप्रति पाठ सुनकर प्रत्येक को पारितोषिक प्रदान करते थे। बालिकाएं भी उनसे अत्यन्त हिल-मिल गई थीं। उनके संरक्षक गण भी पंडित जी की वात्सल्यता देख गद्गद्ग हो जाते थे। घरवालों के बाद पंडित जी ही अपनी छात्राओं के निरीक्षक थे, संरक्षक थे। बालिकाएं इनके घर जातीं, हारमोनियम बजातीं, गातीं, हंसतीं, खेलती, कूदतीं थीं। पंडितजी इससे गद्गद्ग हो जाते थे तथा बाहरवालों से प्रेमाश्रु ढरकाते हुआ कहा करते, ‘‘इन्हीं लड़कियों के कारण मेरा बुढ़ापा कटता चला जा रहा है। अन्यथा अकेले तो इस संसार में मेरा एक दिवस भी काटना भारी पड़ जाता।’’ समस्त संसार पंडितजी की एक मुंह से प्रशंसा करता था।



बाहरवालों को इस प्रकार ठाट दिखाकर पंडितजी दूसरे ही प्रकार का खेल खेला करते थे। वह अपनी नवयौवना सुन्दर छात्राओं को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रेम का पाठ भी पढ़ाया करते थे, परन्तु वह प्रेम, विशुद्ध प्रेम नहीं, वरन प्रेम की आड़ में भोगलिप्सा की शिक्षा थी, सतीत्व विक्रय का पाठ था। काम-वासना का पाठ पढ़ाकर भोली-भाली बालिकाओं का जीवन नष्ट कराकर दलाली खाने की चाल थी, टट्टी की आड़ में शिकार खेला जाता था। पंडित जी के आस-पास युनिवर्सिटी तथा कालेज के छात्र इस प्रकार भिनभिनाया करते थे, जिस प्रकार कि गुड़ के आस पास मक्खियां। विचित्र थे पंडितजी और अद्भुत् थी उनकी माया।



रायबहादुर डा. शंकरलाल अग्निहोत्री का स्थान समाज में बहुत ऊंचा था। सभा-सोसाइटी के हाकिम-हुक्काम में आदर की दृष्टि से देखे जाते थे वह। उनके थी एक कन्या –मुक्ता। वह हजारों में एक थी—सुन्दरता और सुशीलता दोनों में। दुर्भाग्यवश वृद्ध पंडितजी उसे पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए। भोली-भाली बालिका अपने आदर्श को भूलने लगी। पंडित जी ने उसके निर्मल हृदय में अपने कुत्सित महामंत्र का बीजारोपण कर दिया था। अन्य युवती छात्राओं की भांति मुक्ता भी पंडित जी के यहां ‘हारमोनियम’ सीखने जाने लगी।



पंडितजी मुक्ता के रूप लावण्य को किराये पर उठाने के लिए कोई मनचला पैसे वाला ढूंढ़ने लगे। अंत में मणिधर को आपने अपना पात्र चुन लिया। नई-नई कलियों की खोज में भटकने वाला मिलिन्द इस अपूर्व कली का मदपान करने के लिए आकुलित हो उठा। इस अवसर पर पंडितजी की मुट्ठी गर्म हो गई। दूसरे ही दिवस मणिधर को पंडित जी के यहां जाना था। वह संध्या अत्यन्त ही रमणीक थी। मणि ने उसे बड़ी प्रतीक्षा करने के पश्चात पाया था। आज वह अत्यन्त प्रसन्न था। आज उसे पंडितजी के यहां जाना था।...वह लम्बे-लम्बे पग रखता हुआ चला जा रहा था पंडितजी के पापालय की ओर। आज उसे रुपयों की वेदी पर वासना-देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ानी थी।



मुक्ता पंडितजी के यहां बैठी हारमोनियम पर उंगलियां नचा रही थी, और पंडितजी उसे पुलकित नेत्रों से निहार रहे थे। वह बाजा बजाने में व्यस्त थी। साहसा मणिधर के आ जाने से हारमोनियम बंद हो गया। लजीली मुक्ता कुर्सी छोड़कर एक ओर खड़ी हो गई। पंडितजी ने कितना ही समझाया, ‘‘बेटी ! इनसे लज्जा न कर, यह तो अपने ही हैं। जा, बजा, बाजा बजा। अभ्यागत सज्जन के स्वागत में एक गीत गा।’’ परन्तु मुक्ता को अभी लज्जा ने न छोड़ा था। वह अपने स्थान पर अविचल खड़ी थी, उसके सुकोमल मनोहारी गाल लज्जावश ‘अंगूरी’ की भांति लाल हो रहे थे, अलकें आ-आकर उसका एक मधुर चुम्बन लेने की चेष्टा कर रही थीं। मणिधर उस पर मर मिटा था। वह उस समय बाह्य संसार में नहीं रह गया था। यह सब देख पंडितजी खिसक गए। अब उस प्रकोष्ठ में केवल दो ही थे।



मणिधर ने मुक्ता का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘आइए, खड़ी क्यों हैं। मेरे समीप बैठ जाइए।’’ मणिधर धृष्ट होता चला जा रहा था। मुक्ता झिझक रही थी, परन्तु फिर भी मौन थी। मणिधर ने कहा—‘‘क्या पंडितजी ने इस प्रकार आतिथ्य सत्कार करना सिखलाया है कि घर पर कोई पाहुन आवे और घरवाला चुपचाप खड़ा रहे...शुभे, मेरे समीप बैठ जाइये।’’ प्रेम की विद्युत कला दोनों के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। मुक्ता इस बार कुछ न बोली। वह मंत्र-मुग्ध-सी मणि के पीछे-पीछे चली आई तथा उससे कुछ हटकर पलंग पर बैठ गई। ‘‘आपका शुभ नाम ?’’ मणि ने ज़रा मुक्ता के निकट आते हुए कहा। ‘‘मुक्ता।’’ लजीली मुक्ता ने धीमे स्वर में कहा।



बातों का प्रवाह बड़ा, धीरे-धीरे समस्त हिचक जाती रही। और..और !! थोड़ी देर के पश्चात- मुक्ता नीरस हो गई, उसकी आब उतर गई थी।



‘‘हिजाबे नौं उरुमा रहबरे शौहर नबी मानद, अगर मानद शबे-मानद शबे दीगर नबीं मानद।’’



हिचक खुल गई थी। मणि और मुक्ता का प्रेम क्रमशः बढ़ने लगा था। मणि मिलिन्द था, पुष्प पर उसका प्रेम तभी ही ठहर सकता है, जब तक उसमें मद है, परन्तु मुक्ता का प्रेम निर्मल और निष्कलंक था। वह पाप की सरिता को पवित्र प्रेम की गंगा समझकर बेरोक-टोक बहती ही चली जा रही थी। अचानक ठोकर लगी। उसके नेत्र खुल गए। एक दिन उसने तथा समस्त संसार ने देखा कि वह गर्भ से थी।



समाज में हलचल मच गई। शंकरलाल जी की नाक तो कट ही गई। वह किसी को मुँह दिखाने के योग्य न रह गए थे—ऐसा ही लोगों का विचार था। अस्तु। जाति-बिरादरी जुटी, पंच-सरपंच आए। पंचायत का कार्य आरम्भ हुआ। मुक्ता के बयान लिए गए। उसने आंसुओं के बीच सिसकियों साथ-साथ समाज के सामने सम्पूर्ण घटना आद्योपांत सुना डाली— पंडितजी का उसके भोले-भाले स्वच्छ हृदय में काम-वासना का बीजारोपण करना, तत्पश्चात उसका मणिधर से परिचय कराना आदि समस्त घटना उसने सुना डाली। पंडितजी ने गिड़गिड़ाते अपनी सफाई पेश की तथा मुक्ता से अपनी वृद्धावस्था पर तरस खाने की प्रार्थना की। परंतु मणिधर शान्त भाव से बैठा रहा।



पंचों ने सलाह दी। बूढ़ों ने हां में हां मिला दिया। सरपंच महोदय ने अपना निर्णय सुना डाला। सारा दोष मुक्ता के माथे मढ़ा गया। वह जातिच्युत कर दी गई। ‘रायबहादुर के पिता की भी वही राय थी, जो पंचों की थी। मणिधर और पंडितजी को सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे निर्दोषी करार दे दिया गया। केवल ‘अबला’ मुक्ता ही दुख की धधकती हुई अग्नि में झुलसने के लिए छोड़ दी गई। अन्त में अत्यन्त कातर भाव से निस्सहाय मुक्ता ने सरपंच की दोहाई दी—उसके चरणों में गिर पड़ी। सरपंच घबराए। हाय, भ्रष्टा ने उन्हें स्पर्श कर लिया था। क्रोधित हो उन्होंने उस गर्भिणी, निस्सहाय, आश्रय-हीना युवती को धक्के मार कर निकाल देने की अनुमति दे दी। उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए हिन्दू समाज को वास्तव में पतन के खड्ड में गिराने वाले, नरराक्षस, खुशामदी टट्टू ‘पीर बवर्ची, भिस्ती, खर’ की कहावत को चरितार्थ करने वाले इस कलंक के सच्चे अपराधी पंडितजी तत्क्षण उठे उसे धक्का मारकर निकालने ही वाले थे—अचानक आवाज आई ठहरो।



अन्याय की सीमा भी परिमित होती है। तुम लोगों ने उसका भी उल्लंघन कर डाला है।’’ लोगों ने नेत्र घुमाकर देखा, तो मणिधर उत्तेजित हो निश्चल भाव से खड़ा कह रहा था, ‘‘हिन्दू समाज अन्धा है, अत्याचारी है एवं उसके सर्वेसर्वा अर्थात् हमारे ‘माननीय’ पंचगण अनपढ़ हैं, गंवार हैं, और मूर्ख हैं। जिन्हें खरे एवं खोटे, सत्य और असत्य की परख नहीं वह क्या तो न्याय कर सकते हैं और क्या जाति-उपकार ? इसका वास्तविक अपराधी तो मैं हूं। इसका दण्ड तो मुझे भोगना चाहिए। इस सुशील बाला का सतीत्व तो मैंने नष्ट किया है और मुझसे भी अधिक नीच हैं यह बगुला भगत बना हुआ नीच पंडित। इस दुराचारी ने अपने स्वार्थ के लिए न मालूम कितनी बालाओं का जीवन नष्ट कराया है—उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया है। जिस आदरणीय दृष्टि से इस नीच समाज में देखा जाता है वास्तव में यह नीच उसके योग्य नहीं, वरन यह नर पशु है, लोलुपी है, लम्पट है। सिंह की खाल ओढ़े हुए तुच्छ गीदड़ है-रंगा सियार है।’’



सब लोग मणिधर के ओजस्वी मुखमंडल को निहार रहे थे। मणिधर अब मुक्ता को सम्बोधित कर कहने लगा, ‘‘मैंने भी पाप किया है। समाज द्वारा दंडित होने का वास्तविक अधिकारी मैं हूं। मैं भी समाज एवं लक्ष्मी का परित्यग कर तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हें सर्वदा अपनी धर्मपत्नी मानता हुआ अपने इस घोर पाप का प्रायश्चित करूंगा। भद्रे, चलो अब इस अन्यायी एवं नीच समाज में एक क्षण भी रहना मुझे पसंद नहीं...चलो।’’ मणिधर मुक्ता का कर पकड़कर एक ओर चल दिया, और जनता जादूगर के अचरज भरे तमाशे की नाई इस दृश्य को देखती रह गयी।
 

(कहानी का टेक्स्ट गद्यकोश वेबसाइट से साभार )

सोमवार, 13 जनवरी 2014

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

माँ, मैं कायर नहीं !

- श्री सोमनाथ डयानक

एक उच्चतम शिक्षण संस्थान का हॉस्टल क्रमांक चार| कैंटीन से उठती हुयी काफी की महक और गलियारों से आता हुआ छात्रों का उल्लास भरा शोर, आज पियूष को आहत कर रहे थे| हॉस्टल का ये विशिष्ट वातावरण कल तक उसके अंदर एक स्फूर्ति और ताजगी भर देता था, और फ्रेंड्स के साथ रूम में बैठ कर वह भविष्य की नयी नयी तकनीकी डिजाइन करता था| किन्तु आज वह हताशा के गहन अन्धकार में जा पंहुचा था| अभी कुछ महीने पूर्व ही इस संस्थान में आने का गौरव उसे प्राप्त हुआ था| गृह-नगर के प्रत्येक घर में उसके इस अभूतपूर्व चयन की चर्चा हुयी थी| लेकिन आज मिड-सेम के दौरान लगातार दूसरा पेपर बिगड़ने से वह व्याकुलता की सीमा के लाल निशान पर जा पंहुचा था| यद्यपि वह समझ रहा था कि यह दौर अनायास ही नहीं आ गया है| दरअसल यहाँ अध्ययन के कुछ बदले हुए स्वरुप के साथ अब तक वह अपना सामंजस्य नहीं बैठा पाया था| संभवतः उसके सरल मन-मस्तिष्क ने एक प्रतिष्ठित संस्थान में हुए अपने चयन को ही जीवन की अंतिम उपलब्धि मान लिया था| और इस सोच के चलते उसने एक नये सिस्टम के साथ तालमेल बैठाने या समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने के प्रयास ही नहीं किये थे| प्रारंभ के कुछ दिनों तक तो उसने अपनी समस्याओं को मित्रों के समक्ष रखा भी, किन्तु जैसे जैसे दिन गुजर रहे थे उसकी सोच भी बदलती जा रही थी| अब किसी के साथ अपनी समस्या शेयर करने में उसे कठिनाई महसूस होने लगी थी| यह सोच कर कि वह अन्य साथियों के साथ नहीं चल पा रहा है, वह स्वयं को ही कमजोर मानकर क्रमशः हीन भावना का शिकार होने लगा| अपरिचित सी व्यवस्था एवं इससे कभी न उबर पाने का डर उस पर हावी हो गया था| साथियों से दूरियां बढ़ गयी थी, और वह गुम-सुम सा रहने लगा था| 
       
नये सिस्टम को समझने एवं उसके अनुसार स्वयं को ढालने की जगह उसने स्वयं को ही कमतर आंकने की भारी भूल की थी| लेकिन अब तो देर हो चुकी थी| उसके प्राप्तांक संस्थान के मानक स्तर से नीचे आ चुके थे| घर वालों को फोन पर वह केवल इतना बता पाया था कि पेपर बिगड़ गया है| अब वह क्या करेगा, साथी क्या सोचेंगे, अपने गृहनगर किस मुँह से जाएगा इत्यादि सोचते सोचते कितने घंटे बीत गए उसे पता ही न चला| कुछेक कमरों को छोड़कर लगभग सारा हॉस्टल अँधेरे के आगोश में जा चुका था| सुबह के तीन बज चुके थे| पास ही पटरियों से गुजर रही रात्रिकालीन सन्नाटे को तोड़ती हुई ट्रेन की कूक भी पियूष का ध्यान नहीं भंग कर सकी थी| नींद कोसों दूर थी| वह तो बस सोचे जा रहा था| माँ ने तो दिलासा दे दी है कि “हिम्मत नहीं हारना, सब ठीक हो जायेगा| परन्तु उनको कैसे बताएगा कि उसे अब निकाला भी जा सकता है| अपने गृहनगर लौटकर वह लोगों से क्या कहेगा? लोग तो यही कहेंगे कि पियूष इस संस्थान के लायक ही नहीं था| और हर बार वह हीन भावना से भर उठता| शायद मैं इस संस्थान के लिए उपयुक्त नहीं हूँ, वरना मेरे साथ ही ऐसा क्यों? उसे मात्र हताशा भरे दृश्य ही दिखाई दे रहे थे, जैसे वह अपने कमरे से निकल रहा है और सभी उसे ही घूर रहे हैं एक असफल व्यक्तित्व के रूप में| नहीं नहीं...... मैं इनसे नजरें नहीं मिला सकूंगा| मैं यहाँ रुकूंगा ही नहीं| वह कमरे से बाहर आ गया| लेकिन वह जायेगा कहाँ ? अब तो घर भी नहीं जा सकता, अब क्या करेगा? सुबह की हल्की ठण्ड में भी उसकी हथेलियों पर पसीना आ रहा था| अपने कॅरिअर से कहीं ज्यादा लोक-लाज का भय उसके मन मस्तिष्क पर ऐसा दबाव बना रहा था कि उसकी मनोदशा बिगड़ती चली जा रही थी| वह अवसाद के गहन अंधेरों में जा चुका था जहां उसे अब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था| आखिरकार एक वीभत्स निर्णय के साथ वह रेल-पटरी की ओर बढ़ने लगा | अवसाद के जंगल में भटकते हुए वह रेल पटरियों के काफी नजदीक आ गया| अँधेरा उसके इस अवसाद पर मरहम का काम कर रहा था| क्योंकि दिन निकलने पर उस समाज का सामना होना था जिससे वह डर रहा था| वह ट्रेन का इंतज़ार करता हुआ पटरी के पास ही बैठ गया| यद्यपि जीवन-द्वंद लगातार चल रहा था किन्तु कायरता हर बार विजित हो जाती, और वह ट्रेन की प्रतीक्षा में और अधिक व्याकुल हो जाता|
अचानक परिदृश्य परिवर्तित हुआ| उसकी नजर गाय के एक बछड़े पर पडी जो कुछ ही दूरी पर पटरी से उठने का असफल प्रयास कर रहा था| प्रकृति-प्रदत्त कौतुहल अभी भी विद्यमान था| उसने पास जाकर देखा बछड़े का एक पैर काम नहीं कर रहा था | जीवन के द्वंद में हार चुके पियूष पर इस घटना का कुछ विशेष प्रभाव नहीं पड़ा| समय आगे चला और अब दूर से आ रही ट्रेन की कूक भी सुनायी देने लगी| अपनी विपरीत सोच के चलते कमजोर हो चुके पियूष का आत्मनियंत्रण लगभग खत्म हो चुका था| रात्रि के अन्धकार में अब धीरे धीरे प्रकाश कण भी मिलने लगे थे| अतः जल्दी से जल्दी वह इस अंधकार में हमेशा के लिए मिल जाना चाहता था|

तभी बछड़ा व्याकुल होकर रम्भाने लगा| सुबह के धुंधलके में दूर कहीं एक आकृति दिखाई देने लगी जो धूल के गुबार के साथ-साथ इसी ओर चली आ रही थी| इस आकृति के समीप आने पर दृश्य स्पष्ट होने लगा| यह एक गाय थी जो अपने बछड़े की करुण पुकार सुनकर पूरी शक्ति के साथ दौड़ती आ रही थी| गति के साथ तेज हो उठी उसकी साँसे नथुनों से फूंस के रूप में निकलकर जमीन से टकरा रही थी, जिसका प्रतिबिम्ब धूल के गुबार के रूप में उसकी भाव-विव्हलता को व्यक्त कर रहा था| इस दृश्य को देखकर पियूष विचलित हो गया| बरबस ही उसे अपना बचपन याद आ गया| “कैसे पहली रोटी की मांग करने पर माँ मना कर देती थी कि यह तो गाय के लिए है, और कितने प्यार से वह रोटी खिलाने के लिए गाय को पुकार लगाता था|” उसे दौड़ती आ रही उस गाय में अपनी माँ दिखाई देने लगी| “माँ कितनी व्याकुल हो उठेगी जब उसे ज्ञात  होगा कि उसका बेटा .......|” नहीं नहीं मैं क्या कर रहा हूँ? मैं लोक-लाज के चलते अपने माता–पिता, परिवार को इतना भीषण दर्द कैसे दे सकता हूँ? नहीं नहीं मैं समाज से लड़ सकता हूँ, मैं बहुत कुछ कर सकता हूँ, इस बछड़े को मैं बचा सकता हूँ| अवसाद के गहन अँधेरे में मानो प्रकाश की कोई किरण चमक उठी थी| ट्रेन नजदीक थी| वह बछड़े को बचाने के लिए दौड़ पड़ा| बछड़ा बच गया था, और गाय उसे लगातार चाट रही थी| पियूष की आँखें खुल चुकी थी| जीवन को सार्थक करने के लिए एक ही नहीं वरन अनेकों काम पड़े हुए हैं| वह जीवों के लिए काम कर सकता है, वह जीवन से हार मान चुके लोगों के लिए काम कर सकता है, वह समाज के हित में कार्य कर सकता है| उसके मन-मस्तिष्क में बड़े-बड़े नायकों के जीवन-चरित्र उभरने लगे जो विपरीत परिस्थितियों में रहते हुए, कई बार हार कर भी, किन्तु दृढ संकल्प एवं कठोर श्रम के द्वारा आखिरकार विजित हुए| पूर्व दिशा में सोने का गोला लालिमा बिखेरने लगा था | अन्धकार की परते एक-एक कर छंटती जा रही थी| गाय ने एक बार अपने बड़े-बड़े नयनो से पियूष को देखा, मानो धन्यवाद दे रही हो| गाय का इस तरह से निहारना उसे सुखद अहसास करा गया| "माँ मैं कायर नहीं..."- बड़बड़ाता हुआ वह हॉस्टल की ओर वापस चल दिया|
 
( लेखक आई आई टी कानपुर में पदार्थ विज्ञान कार्यक्रम के तकनीकी अधीक्षक पद पर कार्यरत हैं )

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

किरदार - नज़्म



लेखन एवं आवाज़ - निशांत सिंह
सम्पादन, निर्देशन एवं विशेष सहयोग - श्री ओम प्रकाश शर्मा जी 

मित्रों , किरदार एक कहानी-श्रृंखला है | खुद के अन्दर हम सभी न जाने कितने किरदार समेटे हुए हैं जो आपस में लुका छिपी खेलते रहते हैं | कभी हमारे ही भीतर का कोई किरदार हमें बुद्धिजीवी मानता हैं और फिर हमारे ही भीतर का कोई दूसरा किरदार कई विषयों को बौद्धिक चर्चा के दायरे में लाने से संकोच कर जाता है | विश्वास और तर्क की इन लड़ाइयों में हम अक्सर इस प्रश्न पर आकर अटक जाते हैं कि कौन-सा पक्ष उपयुक्त है | दार्शनिक प्रश्नों के समाधान खोजती ऐसी ही एक यात्रा है 'किरदार' | 

इन कहानियों के किरदार इन प्रश्नों में उलझते , उनकी लहरों में तैरते-उतराते अंत में सच को ढूंढते हुए वे अपने सामने आईना रखा हुआ पाते हैं | अब इसके आगे लेखक कुछ नहीं निर्णय करना चाहता -कि क्या जो कुछ आईने में दिख रहा है उसे सच कहा जाये या नहीं ! वो तो श्रोताओं और पाठकों की समझ को कम आँकना होगा |

उम्मीद है कि आप इस श्रृंखला को उत्साह से सुनेंगे और पसंद भी करेंगे और एक नए कहानीबाज को अपनी समीक्षाएं भी समय समय पर देते रहेंगे | जल्द ही आपके लिए प्रस्तुत करेंगे पहली कहानी, धन्यवाद !

सम्पादन, निर्देशन एवं विशेष सहयोग - श्री ओम प्रकाश शर्मा जी 
श्री ओम प्रकाश जी विविध भारती कानपुर में वरिष्ठ कार्यक्रम-प्रस्तोता है और पिछले कई वर्षों से आई आई टी कानपुर के रेडियो ९०.४ को अपनी सेवाओं से लाभान्वित करते रहे हैं |

धन्यवाद - श्रीमती वत्सला जी , श्री अमित त्रिपाठी जी , श्री देव जी एवं समस्त ९०.४ रेडियो टीम

शनिवार, 28 सितंबर 2013

हकीक़त

- निशांत 

एक कोने में बैठे हुए उसे कई बार देखा था । वहां एक बार किसी सिलसिले में आना हुआ था , तभी पहली बार उस पर नज़र पड़ी थी । फिर साल में एकाधे बार उससे मिलने के लिए चला जाया करता था । जाता जरुर था मिलने के लिए मगर कदम उसकी कोठरी के दरवाजे से आगे नहीं बढ़ पाते  थे। कभी वो थोडा गंभीर दीखता था तो कभी कभार कुछ ग़मगीन भी । और मैंने देखा था कि बीच बीच में टहल लिया करता था , शायद जब ख़यालात कम पड़  जाते होंगे तब । हाँ एक बात तय ज़रूर थी और वो ये कि वो जब भी दीखता था तो कोने वाले उसी झरोखे के नज़दीक दीखता था । हो सकता है इसलिए बैठता होगा कि वहां हवा के हलके झोंके रोशनदान से होते हुए दूर कही से किसी का दर्द छुपाये लाते  हों । या फिर इसलिए कि रोशन दान की सलाखो पे लटका हुआ वो चीथड बौराई हवाओ में ऐसे छटपटाता था , मानो  नन्हे कबूतर ने अपने पंख फड़फड़।ये  हो अभी अभी । इन्ही सब आवाजों को पसीजकर उड़ेल दिया करता होगा अल्फाजों के सांचे  में और बना दिया करता होगा एक नयी नज़्म ।


आप पूछेंगे की आखिर वो था कौन ? तो , वो एक शायर था । अपने कमरे में खुद से  क़ैद एक शायर । बाज़ार में जब जाता तो लोग उसे बेवकूफ समझते । खरीद फरोख्त के आम तरीके भी तो नहीं आते थे उसे। नज्मो में मात्राओ की नाप तोल करने में इतना मशगूल रह गया कि दुनिया की रस्मे सीखना भूल ही गया शायद। आखिर वो शायर था , कमरे में क़ैद एक शायर।


उस रोज़ मै उसके कमरे के तरफ से इस मकसद से गुजरा ,जान बूझकर , कि आज उससे रूबरू होकर रहूँगा। उससे पूछूँगा कि आखिर उस काली अँधेरी कोठरी में घुटन नहीं होती होगी उसे? जंजीरों से जकड़ा हुआ नहीं महसूस करता होगा वो? मरीजो की तरह खिड़की के बाहर बेचारगी में आखिर क्या झाँकने की कोशिश करता रहता है वो? 

बड़े जोश के साथ कमरे में घुसा तो पाया कि वो ज़मीन पर लेटा हुआ था , वो भी औंधे मुँह । उसकी नज्मे पुराने ,पीले कागजों पर सवार होकर नाच रही थी कमरे में इधर उधर । और करीब गया तो देखा की हरकत  नहीं थी । धड़कने बंद थी , साँसे चल नहीं रही थी और मुँह  सूख गया था। सारा बदन अकड़  गया था , पेट इतना अन्दर था कि  मानो हफ्तों से अनाज पहुँचही न हो वहां तक । फड़फड़।ते हुए फाखते की तरह उडाता हुआ एक पन्ना आया और उसके चेहरे से चिपक गया । मुझे मह्सूस हुआ कि  वो बंद कमरे वाला शायर मुझसे कह रहा हो , मैं  वो नहीं जिसे तुम घूर रहे हो , जो चिपक गया अभी अभी- वो मेरा चेहरा है, वही हकीकत है मेरी ।

चूँकि मै एक लाश से सवाल जवाब नहीं कर  सकता था इसलिए रूबरू होने का मेरा जोश उसी ठंडी लाश के जैसे ठंडा हो गया। जब उसे कब्र में गाड़ने की बारी आई तो मैंने उसकी कोठरी से बटोरे हुए पन्ने , वहां से ज़ब्त चंद तसवीरें और उसकी दवात साथ में दफ़न करवा दी ।कलम तो उसके हाथो में ही थी , मरने के बाद भी वो छूटी कहाँ थी। क्या कमाल का शायर रहा होगा  वो !

उसकी अंतिम रस्म में भी दो या तीन लोग ही मौजूद थे और अंत में तो सिर्फ अकेला मैं ।खोदने वाले ने आकर मुझसे मेहनताना माँगा क्योकि और कोई उसका रिश्तेदार वहाँ मौजूद नही था। दो सौ रुपये मांगे थे , देने के लिए जेब टटोली ।जेब खाली थी।सुबह के वक़्त शायद जल्दी जल्दी में बटुआ रखना ही भूल गया था । नज़रें उठायीं कुछ देर में तो उसे दबी जुबान में गालियाँ देते हुए जाते पाया।हालांकि उसके जाते जाते मैंने ये वादा  तो उसे कर ही दिया कि घर से आते वक़्त उसके पैसे दे दूंगा । मेरी इस बात को वो किसी सियासी वादे के जैसा मानता हुआ निकल गया, बिना मेरी और कोई ध्यान दिए। 

घर लौटते वक़्त मैं आस पास पसरी हुई अनचाही ख़ामोशी में अपने उन्ही सवालो के जवाब टटोलने की कोशिश कर रहा था । मिले नहीं , बल्कि और उलझते चले गए ।आखिर वो खुद मे कैद रहकर क्या ढूँढता था उस रोशन दान से  झांक कर ?

शायद यही सवाल रहे हो उसके मन में भी या फिर हो सकता है वो मेरे लिए इन सवालों के जवाब ढूँढता रहता हो ।

ख़ैर , सामने देखा तो मेरा प्यारा-सा घर किसी बिरही प्रेयसी की तरह मेरा इंतज़ार कर रहा था।