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शनिवार, 27 सितंबर 2014

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज


आज जबकि भगत सिंह को हर राजनीतिक दल- चाहे वो वामपंथी हो या दक्षिणपंथी- एक आइकॉन के रूप में अपना पोस्टर बॉय बना रहा है तब हमारे सामने ये प्रश्न आता है कि ऐसा क्या है एक क्रांतिकारी युवा शहीद के विचारों में जिससे वे समय के साथ और महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं? उनके नारे और उनके गीत परस्पर विरोधाभासी मंचों से चिल्लाये और गाये जाते रहे हैं। और इसका मतलब यही है कि उन्हें समझा अभी भी नहीं जा रहा है। जैसे कि पुलिस चौकी में लगी उनकी तस्वीरें भी लगभग उसी तरह के विरोधाभास के तत्त्व हैं। जिस ढर्रे की पुलिस और प्रशासन से उनका प्रतिरोध रहा, वो ढर्रा अभी भी कायम है, उन्हीं की तस्वीरों के सामने।

ये प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख साम्प्रदायिकता की समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है।

भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।
यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।

आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है।

शनिवार, 16 अगस्त 2014

बुकोवस्की की एक कविता

 ( चित्र https://www.facebook.com/pages/Charles-Bukowski-Poetry से साभार )

चार्ल्स बुकोवस्की को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं। हम अगर उनके बारे में लिखने लगें तो हमारे पास शब्दों और क्षमता दोनों की कमी पड़ जाएगी। वैसे महान लोगों और विशेषकर कलाकारों को उनके जन्मदिवस पर और कुल मिलाकर बस जन्मदिवस पर ही याद करने की एक अघोषित परंपरा रही है और इसी को आगे बढ़ाने के लिए मुझे खेद है। लेकिन अच्छा है कि इसी बहाने हम उन्हें याद कर लिया करते हैं। वरना हम फ़ुर्सत भी कहाँ निकाल पाते हैं इस सब लिए !

उनकी एक प्रसिद्ध कविता "Roll The Dice" उनकी स्टाइल को अच्छी तरह से सामने रखती है। और ये एक ऐसी बात हमारे सामने रखती है जिस पर हम ख़ुद भरोसा नहीं करते लेकिन बुकोवस्की के कहने पर ऐसा करने का जी चाहता है। हिंदी अनुवाद का प्रयास किया है, पता नहीं कैसा है। अपनी समझ से किया है, मेरी समझ में बुकोवस्की कम आएं हों तो संवाद और सुधार की पूरी गुंजाइश है।  कविता और उसका अनुवाद ये रहा-

"अग़र कुछ करना है 
तो कर डालो 
वरना शुरू भी मत करना  !

 अग़र कुछ करना है 
तो कर डालो 
भले ही तुमसे छूट जाए
तुम्हारी  प्रेमिका 
या पत्नी 
या नौकरी 
या फ़िर तुम्हारा दिमाग  

लेकिन तुम कर डालो  !


हो सकता है
तुम कुछ खा भी न पाओ 
कई दिनों तक 
सर्दी में ठिठुरते रहो 
बाहर किसी बेंच पर 
जेल भी जाना पड़े शायद 
सहना पड़े  उपहास 
सहने पड़े लोगों  के ताने 
और अकेलापन  । 

अकेलापन एक उपहार है 
और बाकी सब परीक्षा है 
तुम्हारे धैर्य की 
और  तुम्हारे जूनून की  
कि  तुम किस हद तक जाओगे 
ऐसा कर डालने के लिए । 

और तुम कर जाओगे 
लोगों के साथ बिना भी 
तमाम  रुकावटों  के बाद भी 
तुम कर जाओगे  उसे
किसी भी और चीज़ से बेहतर । 

अग़र कुछ सोचा है करने को 
तो  पूरा करना ज़रूर 
उसके जैसा कोई एहसास नहीं । 

और जब तुम  बढ़ जाओगे आगे 
तो पाओगे  अपने चारों तरफ़\
आग से चमकती रात 
लेकिन तुम आगे बढ़ना 
तुम करना, तुम करना , पूरा हासिल करना 
छोड़ना नहीं कहीं बीच में । 

जब  पूरा कर लोगे  वो 
जो सोचा था 
उस  भरपूर ख़ुशी के बीच 
लड़ना होगा तुम्हें 
असली युद्ध ! "


English Original :

"If you’re going to try, go all the way. Otherwise, don’t even start. If you’re going to try, go all the way. 

This could mean losing girlfriends, wives, relatives, jobs and maybe your mind. Go all the way. It could mean not eating for 3 or 4 days. It could mean freezing on a park bench. It could mean jail, it could mean derision, mockery, isolation.

Isolation is the gift, all the others are a test of your endurance, of how much you really want to do it. And you’ll do it despite rejection and the worst odds and it will be better than anything else you can imagine. 

If you’re going to try, go all the way. There is no other feeling like that. You will be alone with the gods and the nights will flame with fire. Do it, do it, do it. Do it. All the way all the way. 

You will ride life straight to perfect laughter, it’s the only good fight there is."

बुधवार, 5 मार्च 2014

नैनो-तकनीकी: तकनीकी यात्रा

  - सोमनाथ डनायक   
                                   
आइये आपको ले चलते हैं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के पदार्थ विज्ञान कार्यक्रम में स्थित “नैनो अभियांत्रिकी पदार्थ प्रयोगशाला” की ओर| प्रवेश द्वार क्रमांक 3 के समीप स्थित यह विभाग अकादमी परिसर के पश्चिमी सिरे पर स्थित है| विभाग के मुख्य द्वार के समीप खड़े पाम के वृक्ष, पुष्प वाटिका एवं सेमल के वृक्ष से उड़ते हुए कपास वातावरण को रमणीय बनाते हैं| यदि आप किसी सुरम्य पहाड़ी स्थल की कल्पना में खो गए हों तो बता दें कि मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करते ही आपको सैलानी नहीं मिलेंगे| बेशक यहाँ कुछ महिलायें एवं पुरुष अपने हाथों में सैम्पल बॉक्स, डेसिकेटर या कुछ विचित्र से दिखाई पड़ने वाले यंत्र लिए हुए अवश्य नजर आते हैं| और ये होते हैं हमारे शोधार्थी, जो कि अपने नव निर्मित पदार्थों के अभिलाक्षणिक विश्लेषण (कैरेक्टराईजेशन) हेतु एक्स-रे, इलेक्ट्रान-सूक्ष्मदर्शी या चुम्बक विज्ञान आदि प्रयोगशालाओं में भ्रमण करते रहते हैं| प्रयोगशाला पंहुचने से पहले आइये समझने की कोशिश करते है कि नैनो साइंस है क्या? 

नैनो किसी इकाई का एक अरबवां भाग होता है जो अति सूक्ष्मतम है| 1 नैनोमीटर 1 मीटर का दस करोड़वाँ भाग (10-9 मी.) होता है| तुलनात्मक रूप में मनुष्य का एक औसत मोटाई का बाल 1 नैनोमीटर का 1 लाख गुना होता है | प्रायोगिक गणनाओं के अनुसार पदार्थों में निहित दो परमाणुओं के मध्य की दूरी लगभग 10 नैनोमीटर होती है| इसे हम 1 आंग्स्ट्रॉम कहते हैं| सरल शब्दों में तकनीकी कौशल के माध्यम से पदार्थों एवं उपकरणों का नैनो स्तर पर प्रबंधन एवं निर्माण ही नैनो तकनीकी के अंतर्गत आता है| नैनो तकनीकी के सम्बन्ध में प्रथम परिकल्पना (देअर आर प्लेंटी आफ रूम्स एट दी बाटम) सन 1959 में एक भौतिकविद रिचर्ड फेंमन द्वारा की गयी थी| “नैनो टेक्नोलॉजी” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1974 में प्रो. नोरियो तानिगुची ने किया जो एक अमेरिकन इंजीनिअर किम इरिक ड्रेक्सलर द्वारा लिखित पुस्तक “इंजिन्स ऑफ क्रियेशन : दी कमिंग इरा ऑफ नैनो टेक्नोलॉजी” के द्वारा अत्यधिक प्रचारित हुआ| प्रारंभ में नैनो तकनीकी एक वैज्ञानिक परिकल्पना मात्र थी जिसे स्कैनिंग टनलिंग माइक्रोस्कोप (एस.टी.एम.) की खोज ने वास्तविकता में बदल डाला| इसकी सहायता से न केवल परमाणु को देखा जा सकता है बल्कि इसका प्रबंधन भी किया जा सकता है|

हम सभी जानते हैं कि हमारे आसपास दिखाई देने वाले सभी पदार्थ, पेड़–पौधे यहाँ तक कि हम सभी परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं| यह किसी भी पदार्थ में निहित सूक्ष्मतम इकाई होती है| विभिन्न पदार्थों में इन परमाणुओं की व्यवस्था भिन्न भिन्न हो सकती है| ये व्यवस्थाएं घनाभ, आयताकार, षट्कोणीय इत्यादि हो सकती हैं जो प्रमुख रूप से 7 प्रकार की होती हैं| इन प्रकारों के अनुरूप किनारों पर, मध्य में अथवा सतहों के मध्य में परमाणु या उनके समूह (मोटिफ) स्थित होते हैं| परमाणुओं की ये विभिन्न संरचनायें इकाई कोशाणु (यूनिट सेल) कहलाती है जो त्रिआयामी बिंदु क्रम (स्पेस लैटिस) में अपनी पुनरावृत्ति करती है| इकाई कोशाणु की इस पुनरावृत्ति से क्रिस्टल का निर्माण होता है एवं दिखाई देने वाले विभिन्न क्रिस्टलाइन पदार्थ इन्ही क्रिस्टलों का समूह होते हैं| विभिन्न पदार्थों के अभिलक्षण उनकी इकाई कोशाणु की संरचना पर निर्भर रहते हैं| उदाहरण के तौर पर हीरा और ग्रेफाइट दोनों ही कार्बन परमाणुओं से मिलकर बने होते हैं किन्तु दोनों के इकाई कोशाणु की संरचना में अंतर होने के कारण दोनों पदार्थों के गुणधर्म भिन्न होते हैं| जहां हीरा अभी तक उपलब्ध पदार्थों में सबसे कठोर है वहीं ग्रेफाइट अत्यंत नरम होता है| ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक है जबकि हीरा नहीं| हीरे की यूनिट सेल घनाभ होती है जिसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु चतुष्फलक पर स्थित अपने निकटतम चार परमाणुओं, जो कि बराबर दूरी पर होते हैं, के साथ मजबूत बंध बनाते हैं| कोई भी परमाणु इस दृढ संरचना से नहीं निकल सकने के कारण ही हीरा इतना कठोर होता है| जबकि ग्रेफाइट के  इकाई कोशाणु की संरचना षट्कोणीय प्रकार की होती है जिसमें प्रत्येक कार्बन परमाणु अपनी ही परत में स्थित एवं निकटतम तीन परमाणुओं के साथ तो मजबूत बंध बनाते हैं किन्तु विभिन्न परतों के मध्य का बंध काफी कमजोर होता है जिससे ये परतें परस्पर गति कर सकती हैं| और यही ग्रेफाइट को नरम बनाता है| यदि किसी प्रकार हम सीस पेन्सिल में स्थित ग्रेफाइट के परमाण्विक स्तर तक पंहुच कर इसके षट्कोणीय इकाई कोशाणु को घनाभ रूप में (हीरे के सामान) व्यवस्थित कर दें तो यह हीरे में तब्दील हो जायेगा| सामान्य शब्दों में पदार्थों के परमाणविक स्तर पर पंहुच कर कारीगरी करना ही नैनो तकनीकी के अंतर्गत आता है|
नैनो तकनीकी किसी विशिष्ट इन्जीनिअरिंग या विज्ञान का अध्ययन क्षेत्र नहीं वरन कई प्रकार की तकनीकों, प्रौद्योगिकी, एवं प्रसंस्करण का समूह है, जिसके अंतर्गत नैनो मटेरियल्स, नैनोरोबोटिक्स, नैनो इलेक्ट्रॉनिक्स, नैनो मैकेनिक्स, नैनो मेडिसिन्स इत्यादि विषय आते हैं| ये सभी विषय भले ही अलग अलग हैं किन्तु इन सभी में जो समान है वह है मापन का पैमाना| सर्वमान्य धारणा के अनुसार नैनो तकनीकी का कार्यक्षेत्र 1 से 100 नैनोमीटर के मध्य का होता है| 100 नैनोमीटर से ऊपर का मापन  क्रमशः माइक्रो  एवं मेक्रो स्केल (प्रचलित वृहत पैमाना जिसका हम दैनिक जीवन में उपयोग करते हैं) के अंतर्गत आता है साथ ही 1 नैनोमीटर से नीचे का पैमाना अॅटामिक स्केल कहलाता है|  देखा गया है कि 100 नैनोमीटर के नीचे जाने पर पदार्थों के गुण एवं अभिलक्षण आश्चर्यजनक रूप से बदल जाते हैं| उदहारण के तौर पर नेनो स्केल पर तांबा पारदर्शी हो जाता है| चांदी के नैनो चूर्ण के एंटी बैक्टीरियल और एंटी फंगल होने का पता चला है| कई दवाओं में इसके प्रयोग के साथ साथ इस पर अनेकों वैज्ञानिक शोध चल रहे हैं| नैनो स्केल पर पदार्थों के स्वभाव में होने वाले इस परिवर्तन के पीछे दो मुख्य कारण हैं| पहला है “क्वांटम मेकेनिकल प्रभाव” जो कि अत्यंत लघु विस्तार पर कार्य करता है| दूसरा है “पृष्ठक्षेत्र एवं आयतन का अनुपात” बढ़ जाना| यह अनुपात पदार्थों की क्रियाशीलता के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण होता है| इसे इस तरह समझा जा सकता है कि यदि एक बड़े लड्डू को तोड़कर कई छोटे छोटे लड्डू बना दिए जाएँ और सभी छोटे लड्डुओं के सतह के क्षेत्रफल को जोड़ा जाये तो यह उस बड़े लड्डू के सतह के क्षेत्रफल से बहुत अधिक होगा|  इस प्रकार नेनो स्तर पर पदार्थ की बाहरी सतह से परमाणुओं की दूरी बहुत ही कम होगी एवं ये परमाणु उच्च ऊर्जा अवस्था (हाई इनर्जी स्टेट) को प्राप्त करके पदार्थ के गुण-धर्म को अत्यधिक प्रभावित करेंगे| यही कारण है कि धातु उत्प्रेरकों की क्रिया शीलता उनके कणों का आकार घटाने पर बढ़ जाती है| सोना जो कि मेक्रो स्केल पर रासायनिक रूप से अक्रिय धातु है, नैनो स्केल पर न केवल अत्यधिक क्रियाशील हो जाता है बल्कि इसका गलनांक भी कम हो जाता है| संक्षिप्त में नैनो तकनीकी, पदार्थों का नैनो विस्तार पर नियंत्रित प्रबंधन कर विशिष्ट गुण-धर्मों वाले पदार्थों का निर्माण करने की अनूठी तकनीकी है|
                                      

और बातों ही बातों में हम आ पंहुचे हैं “नैनो अभियांत्रिकी पदार्थ प्रयोगशाला” यानी अपनी मंजिल तक| अरे! यहाँ तो माइक्रोवेव ओवेन भी रखा हुआ है ? 

(छायाचित्र- AFM लैब, प्रो. आशुतोष शर्मा जी से साभार)


ये खाना पकाने के लिए नहीं है| इसका उपयोग ग्रेफाईट के अपपर्णन (एक्सफोलिएशन) के लिए किया जाता है| इसमे ग्रेफाईट की मोटी पर्त को नैनो स्तर की असंख्य पर्तों में विभाजित किया जाता है, जिसे ग्रॅफीन कहते हैं| इसे बनाने के लिए गंधक अम्ल एवं  पोटेशियम परमैग्नेट जैसे अभिकर्मक के उपयोग से ग्रेफाईट का आक्सीकरण किया जाता है जो इसकी परतों के बीच की दूरी बढ़ाने में सहायक होता है| ग्रेफाईट आक्साइड माइक्रोवेव्स का अच्छा अवशोषक है| डीआक्सीजेनेशन क्रिया को सक्रिय करने के लिए अल्प मात्रा में ग्रॅफीन मिलाकर इसे माइक्रोवेव ओवेन में रख दिया जाता है| इस तरह ग्रेफाईट के असंख्य परतों में टूटने से एकल परामाणु पर्त वाली ग्रॅफीन प्राप्त हो जाती है| इस पर्त की मोटाई एक सामान्य पेपर का एक लाखवाँ भाग या उससे भी कम हो सकती है| यह कार्बन का द्विआयामी अपरूप (टू डायमेंशनल एलोट्रोप) है| द्विआयामी इसलिए क्योंकि नैनो स्तर पर होने के कारण इसकी मोटाई नगण्य होती है| यह अद्भुत रूप से हल्का और मजबूत पदार्थ है जिसकी उष्मा चालकता (थर्मल कन्डक्टिविटी) एवं इलेक्ट्रॉनिक मोबिलिटी अन्य पदार्थों के मुकाबले बहुत अधिक होती है| इस तरह उपयोग की दृष्टि से यह पदार्थ इलेक्ट्रॉनिक्स, अधिक दक्षता वाले सोलर सेल और मिश्रित-पदार्थों से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक अपनी सार्थकता सिद्ध करता है|  

प्रयोगशाला में सी.वी.डी. नामक एक विशिष्ट प्रणाली भी यहाँ का एक प्रमुख आकर्षण है| इसमें विभिन्न गैस सिलिंडरों से निकलती हुयी कुछ नलियाँ कांच के कई बल्बों जिनमें नीले एवं सफ़ेद से दिखाई देने वाले पदार्थ भरे हुए हैं, से गुजरती हुयी दिखाई देती हैं| इस प्रणाली का अंतिम सिरा निकलकर एक विद्युत भट्टी में जाता है एवं भट्टी के दूसरे सिरे से किसी गैस के लगातार हो रहे रिसाव का आभास मिलता है| इसे समझने में हमारी मदद की यहाँ के एक वरिष्ट शोधार्थी ने| यह है रासायनिक वाष्प निक्षेपण प्रणाली (केमिकल वेपर डिपॅाज़ीशन सिस्टम)| इस प्रणाली के उपयोग से यहाँ प्रायोगिक स्तर पर सी.एन.टी. (कार्बन नेनो ट्यूब) का निर्माण किया जाता है| सी.एन.टी. वास्तव में ग्रॅफीन की पर्त का नलीनुमा प्रतिरूप है, जिसका व्यास 1 से 50 नैनोमीटर तक हो सकता है| यह आधुनिक विज्ञान के लिए एक रोमांचकारी पदार्थ है जो स्टील से कई गुना मजबूत एवं हीरे से भी अधिक सामर्थ्य वाला है| अन्य फाइबर पदार्थों की तुलना में यह अत्यधिक कठोर एवं साथ ही साथ विद्युत एवं ऊष्मा का बहुत अच्छा सुचालक है|  

इसे बनाने के लिए किसी हाईड्रोकार्बन गैस को क्रमश: सिलिका जेल एवं कैल्सियम क्लोराइड जैसे नमी एवं अशुद्धि शोषक पदार्थों के बल्बों से गुजारते हुए एक विद्युत भट्टी में प्रवाहित किया जाता है| इस भट्टी का तापमान 600 से 1100 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो सकता है, जहाँ हाइड्रोकार्बन अपने अवयवों में विखंडित हो जाता है| आयरन, कोबाल्ट या निकिल जैसे किसी उत्प्रेरक को भट्टी में रखा या प्रवाहित किया जाता है, जिन पर कार्बन वाष्प के लगातार जमा होने से सी.एन.टी. ग्रो करती है| वायु की क्रियाशीलता से बचाने हेतु  यह सारी प्रक्रिया निर्वात या किसी अक्रिय गैस जैसे नाईट्रोजन की उपस्थिति में की जाती है|  यहाँ हम देखते हैं कि कार्बन की इन नैनो नलियों का निर्माण एक स्वत: प्रक्रिया के रूप में होता है जिसमे  पदार्थ की सबसे छोटी इकाई यानी कि परमाणु लगातार जुड़कर नयी रचना करते हैं इसलिए नैनो साइंस की भाषा में इसे “बाटम अप एप्रोच” कहा जाता है| इसी तरह ग्रेफाईट की पर्त को अपपर्णन के द्वारा असंख्य नैनो परतों में विभाजित कर ग्रॅफीन बनाने की प्रक्रिया को “टॉप डाउन एप्रोच” कहते हैं|  अत्यधिक हल्का और मजबूत पदार्थ होने के कारण सी.एन.टी. का उपयोग हल्की और अत्यधिक मजबूत कारों, वायुयान एवं स्पेस एलीवेटर से लेकर अनेक कार्यों में किया जा सकता है|  

तुलनात्मक रूप से अजीवित पदार्थों के लिए नैनो तकनीकी नयी हो सकती है परन्तु जीवित के क्षेत्र में नैनो तकनीकी नयी नहीं है| उदहारण स्वरुप हमारा शरीर विशिष्ट क्रम में स्थित असंख्य जीवित कोशिकाओं से मिलकर बना होता है, जो कि एंजाइम्स के बारीक एवं उत्कृष्ट कार्यप्रणाली के उपयोग से विभिन्न परमाणुओं एवं अणुओं को जीवनोपयोगी जटिल माइक्रोस्कोपिक संरचनाओं में परिवर्तित करते हैं| इन जीवित प्राकृतिक पदार्थों में अत्यधिक दक्षता एवं क्षमता समाहित होती है| जैसे कि सौर उर्जा को सोखने की क्षमता, खनिज द्रव्यों एवं पानी को जीवित कोशिका में बदलना, तंत्रिका कोशिका में विशाल आंकड़ा-भण्डारण एवं इसका संचालन, डी.एन.ए. अणु में संचित असंख्य बिट जानकारी की कुशलतापूर्वक प्रतिकृति तैयार करना इत्यादि |  नैनो तकनीकी अभी अपने आरम्भ पर है| समय के साथ इसके प्रयोग के द्वारा वर्तमान उद्योगों में नाटकीय बदलाव देखने मिल सकते हैं| कार्बन, सिलिकन एवं हाइड्रोजन जैसे बहुतायत में पाए जाने वाले पदार्थों के अणुओं को इच्छित विन्यास के रूप में प्रबंधित कर नैनो संरचना वाले ऐसे पदार्थ तैयार किये जा सकेंगे जो प्रत्येक विशिष्ट उपयोग के लिए सटीक एवं वांछित गुणों वाले होंगे| इन पदार्थों के निर्माण के लिए बड़ी बड़ी मशीनों, चिमनियों या अत्यधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती, वरन इनकी वृद्धि रासायनिक उत्प्रेरकों एवं कृत्रिम विकर (सिंथेटिक एंजाइम) के साथ संयोजन कर अथवा सांचागत (पैटर्निंग) एवं स्वत: निर्माण (सेल्फ एसेम्बलिंग) जैसी नयी तकनीकी के द्वारा पूर्व निर्धारित प्रारूप में की जा सकती है| नैनो तकनीकी भविष्य की कुंजी है, और कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले समय में यह विश्व में क्रांतिकारी परिवर्तन लायेगी| तो क्या हम ऐसी कल्पना कर सकते हैं कि आने वाले समय में हम आधे मनुष्य और आधे यंत्र हो जायेंगे, और भुलक्कड़ लोगों के लिए एक छोटी सी मॅमोरी चिप शरीर में प्रत्यारोपित की जाएगी, जो हमारे तंत्रिका तंत्र के द्वारा संचालित हो सकेगी?  

(लेखक संस्थान में पदार्थ विज्ञान कार्यक्रम के तकनीकी अधीक्षक के पद पर कार्यरत हैं) 





शनिवार, 28 सितंबर 2013

हकीक़त

- निशांत 

एक कोने में बैठे हुए उसे कई बार देखा था । वहां एक बार किसी सिलसिले में आना हुआ था , तभी पहली बार उस पर नज़र पड़ी थी । फिर साल में एकाधे बार उससे मिलने के लिए चला जाया करता था । जाता जरुर था मिलने के लिए मगर कदम उसकी कोठरी के दरवाजे से आगे नहीं बढ़ पाते  थे। कभी वो थोडा गंभीर दीखता था तो कभी कभार कुछ ग़मगीन भी । और मैंने देखा था कि बीच बीच में टहल लिया करता था , शायद जब ख़यालात कम पड़  जाते होंगे तब । हाँ एक बात तय ज़रूर थी और वो ये कि वो जब भी दीखता था तो कोने वाले उसी झरोखे के नज़दीक दीखता था । हो सकता है इसलिए बैठता होगा कि वहां हवा के हलके झोंके रोशनदान से होते हुए दूर कही से किसी का दर्द छुपाये लाते  हों । या फिर इसलिए कि रोशन दान की सलाखो पे लटका हुआ वो चीथड बौराई हवाओ में ऐसे छटपटाता था , मानो  नन्हे कबूतर ने अपने पंख फड़फड़।ये  हो अभी अभी । इन्ही सब आवाजों को पसीजकर उड़ेल दिया करता होगा अल्फाजों के सांचे  में और बना दिया करता होगा एक नयी नज़्म ।


आप पूछेंगे की आखिर वो था कौन ? तो , वो एक शायर था । अपने कमरे में खुद से  क़ैद एक शायर । बाज़ार में जब जाता तो लोग उसे बेवकूफ समझते । खरीद फरोख्त के आम तरीके भी तो नहीं आते थे उसे। नज्मो में मात्राओ की नाप तोल करने में इतना मशगूल रह गया कि दुनिया की रस्मे सीखना भूल ही गया शायद। आखिर वो शायर था , कमरे में क़ैद एक शायर।


उस रोज़ मै उसके कमरे के तरफ से इस मकसद से गुजरा ,जान बूझकर , कि आज उससे रूबरू होकर रहूँगा। उससे पूछूँगा कि आखिर उस काली अँधेरी कोठरी में घुटन नहीं होती होगी उसे? जंजीरों से जकड़ा हुआ नहीं महसूस करता होगा वो? मरीजो की तरह खिड़की के बाहर बेचारगी में आखिर क्या झाँकने की कोशिश करता रहता है वो? 

बड़े जोश के साथ कमरे में घुसा तो पाया कि वो ज़मीन पर लेटा हुआ था , वो भी औंधे मुँह । उसकी नज्मे पुराने ,पीले कागजों पर सवार होकर नाच रही थी कमरे में इधर उधर । और करीब गया तो देखा की हरकत  नहीं थी । धड़कने बंद थी , साँसे चल नहीं रही थी और मुँह  सूख गया था। सारा बदन अकड़  गया था , पेट इतना अन्दर था कि  मानो हफ्तों से अनाज पहुँचही न हो वहां तक । फड़फड़।ते हुए फाखते की तरह उडाता हुआ एक पन्ना आया और उसके चेहरे से चिपक गया । मुझे मह्सूस हुआ कि  वो बंद कमरे वाला शायर मुझसे कह रहा हो , मैं  वो नहीं जिसे तुम घूर रहे हो , जो चिपक गया अभी अभी- वो मेरा चेहरा है, वही हकीकत है मेरी ।

चूँकि मै एक लाश से सवाल जवाब नहीं कर  सकता था इसलिए रूबरू होने का मेरा जोश उसी ठंडी लाश के जैसे ठंडा हो गया। जब उसे कब्र में गाड़ने की बारी आई तो मैंने उसकी कोठरी से बटोरे हुए पन्ने , वहां से ज़ब्त चंद तसवीरें और उसकी दवात साथ में दफ़न करवा दी ।कलम तो उसके हाथो में ही थी , मरने के बाद भी वो छूटी कहाँ थी। क्या कमाल का शायर रहा होगा  वो !

उसकी अंतिम रस्म में भी दो या तीन लोग ही मौजूद थे और अंत में तो सिर्फ अकेला मैं ।खोदने वाले ने आकर मुझसे मेहनताना माँगा क्योकि और कोई उसका रिश्तेदार वहाँ मौजूद नही था। दो सौ रुपये मांगे थे , देने के लिए जेब टटोली ।जेब खाली थी।सुबह के वक़्त शायद जल्दी जल्दी में बटुआ रखना ही भूल गया था । नज़रें उठायीं कुछ देर में तो उसे दबी जुबान में गालियाँ देते हुए जाते पाया।हालांकि उसके जाते जाते मैंने ये वादा  तो उसे कर ही दिया कि घर से आते वक़्त उसके पैसे दे दूंगा । मेरी इस बात को वो किसी सियासी वादे के जैसा मानता हुआ निकल गया, बिना मेरी और कोई ध्यान दिए। 

घर लौटते वक़्त मैं आस पास पसरी हुई अनचाही ख़ामोशी में अपने उन्ही सवालो के जवाब टटोलने की कोशिश कर रहा था । मिले नहीं , बल्कि और उलझते चले गए ।आखिर वो खुद मे कैद रहकर क्या ढूँढता था उस रोशन दान से  झांक कर ?

शायद यही सवाल रहे हो उसके मन में भी या फिर हो सकता है वो मेरे लिए इन सवालों के जवाब ढूँढता रहता हो ।

ख़ैर , सामने देखा तो मेरा प्यारा-सा घर किसी बिरही प्रेयसी की तरह मेरा इंतज़ार कर रहा था।