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रविवार, 18 अक्टूबर 2015

The Organizer: श्रमिक-एकता की एक बेमिसाल कहानी

-निशांत
एक ऐसी फिल्म जिसके बारे में आप जानते नहीं हों लेकिन जिसे आप हमेशा देखना चाहते रहे हों उसे देखने के बाद का अनुभव अद्भुत रहता है.
Marcello Mastroianni​ एक लेबर एक्टिविस्ट प्रोफेसर के किरदार में हैं जो परिस्थितिवश ट्यूरिन (इटली) के टेक्सटाइल मज़दूरों को ओर्गनाइज करते हैं. 18वीं सदी के आख़िर में ब्रिटेन से बाहर बाकी यूरोप में लम्बे working hours (14 घंटे प्रतिदिन) और अन्य अन्यायपूर्ण दमनकारी प्रवृत्तियों के खिलाफ़ श्रम की ताक़त (पॉवर ऑफ़ लेबर) ने किस तरह ख़ुद को आज़माना शुरू किया और इस संघर्ष ने किस तरह अपना रास्ता इख्तियार किया- इसे फिल्म का स्क्रीनप्ले सटीक पंक्चुएशन के साथ प्रस्तुत करता है. फिल्म उस ऐतिहासिक दौर के स्नैपशॉट्स का मोंटाज बन पड़ी है. किसी ने लिखा है-"... the film is not so much a call to action as to recollection—both a historical monument and a taboo-breaking depiction of a specific moment."

[Prof. Sinigaglia (Mastroianni) एक दृश्य में कामगारों को संबोधित करते हुए. चित्र: filmforum.org/film/the-organizer-copy]
निर्देशन इतना प्रभावी और कहानी बेकार के मेक-अप से इतनी दूर है है कि आप फिल्म को देखने के दौरान खुद को working-class के साथ ट्यूरिन में पूरी solidarity के साथ मौजूद पाएँगे. चूँकि प्रोफेसर का किरदार एक आउटसाइडर की तरह कहानी में प्रवेश लेता है तो उसका मौजूद होना दर्शक की मौजूदगी में मदद करता है. 
एक दृश्य है कि प्रोफेसर और जवान श्रमिक राओल मजदूर संघर्ष के सफल होने के चांसेस पर डिबेट कर रहे हैं-
राओल- तुम हमारी तरह नहीं हो. तुम हममें से नहीं हो. जिस तरह अचानक एक दिन आए थे, उसी तरह एक दिन गायब हो जाओगे.
प्रोफेसर- बिलकुल ठीक. मैं तुम लोगों जैसा नहीं हूँ. मेरा घर नहीं, परिवार नहीं, न दोस्त, अगर कोई मेरी परवाह करता है तो वो है पुलिस.
राओल- तो फिर तुम ये सब कर क्यों रहे हो ?
प्रोफेसर- क्यों?... क्योंकि मेरे पास इतने सारे बेवक़ूफ़ लगने वाले विचार हैं.
एक अन्य दृश्य में प्रोफेसर की आर्गेनाईजेशन का एक अन्य साथी पूछता है कि हम ये सब कर क्यों रहे हैं ? प्रोफेसर का जवाब होता है कि शायद हम सब (labor activists) के दिमाग फिर गये हैं.
इसी सिलसिले में एक अन्य दृश्य है-
"आप प्रोफेसर हैं. इन सब चक्करों में कैसे पड़े ?"
"ख़ुदगर्ज़ होने के कारण."
"मैं समझी नहीं."
"ये मेरी पसंद है. और जब आपको कुछ पसंद है तो ये त्याग नहीं हुआ. और ये सब कुछ इसलिए करना है ताकि एक दिन तुम्हारे जैसी कोई लड़की वो करने को मजबूर न हो जो तुम्हें करना पड़ रहा है. "
फिल्म के सबसे प्रभावी दृश्यों में से एक अंतिम दृश्य है. संघर्ष के दौरान पुलिस की गोली का शिकार होने वाले एक कम-उम्र मजदूर का छोटा भाई (करीब 10 साल उम्र)- जिसके लिए उसके बड़े भाई का सपना था कि वो ग्रेजुएट करे- अंततः मजदूरी करने को मजबूर होता है. 'और चक्र चलता जाता है'- ये फिल्म के कथ्य का निहित सन्देश उभरता है. लेकिन इसे पेसिमिस्ट विचार के तौर पर डेवेलप होने नहीं दिया गया है जो इसे प्रामाणिकता देता है.
उस दौर को फिल्म का सब्जेक्ट बनाकर बात कहने का Gillo Pontecorvo ( Burn!, The Battle of Algiers) ने जो अंदाज़ लिया उससे Mario Monicelli का अंदाज़ बहुत फ़र्क है. दृश्यों में एक किस्म की कॉमेडी है जो उन्हें ज़िंदा बनाने में कामयाब होती है. कोई किरदार परफेक्ट नहीं है. अंत में सब कुछ ठीक नहीं हो जाता, लेकिन संघर्ष रुकता भी नहीं है. पार्लियामेंट्री तरीकों का मोड़ देना आगे आने वाले दौर की राजनीति से कहानी को जोड़ता है. हां, ये संघर्ष जिनके लिए fatal कहा जाता है- यानि वो वर्कर जो हड़ताल afford नहीं कर सकता- उस किरदार को भी कहानी में न्याय मिला है और वो भी solidarity का हिस्सेदार साबित हुआ है.
कहा जाए तो labor movement के इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र में थोड़ा भी interest रखते हों तो इसे और पोंतेकोर्वो की फिल्मों को जरुर देखें. इस समय में जब सामाजिक चेतना को तैयार करने वाले फिल्मकारों की कमी है तो The Organizer, Burn !, The Battle of Algiers, The Working Class Goes to Heaven, मंथन - इन फिल्मों को rediscover करने की जरुरत है.

Trailer: https://www.youtube.com/watch?v=e-PZ6w_2wp0
Rotten Tomatoes: http://www.rottentomatoes.com/m/the_organizer/

शनिवार, 27 सितंबर 2014

साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज


आज जबकि भगत सिंह को हर राजनीतिक दल- चाहे वो वामपंथी हो या दक्षिणपंथी- एक आइकॉन के रूप में अपना पोस्टर बॉय बना रहा है तब हमारे सामने ये प्रश्न आता है कि ऐसा क्या है एक क्रांतिकारी युवा शहीद के विचारों में जिससे वे समय के साथ और महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं? उनके नारे और उनके गीत परस्पर विरोधाभासी मंचों से चिल्लाये और गाये जाते रहे हैं। और इसका मतलब यही है कि उन्हें समझा अभी भी नहीं जा रहा है। जैसे कि पुलिस चौकी में लगी उनकी तस्वीरें भी लगभग उसी तरह के विरोधाभास के तत्त्व हैं। जिस ढर्रे की पुलिस और प्रशासन से उनका प्रतिरोध रहा, वो ढर्रा अभी भी कायम है, उन्हीं की तस्वीरों के सामने।

ये प्रस्तुत लेख जून, 1928 के ‘किरती’ में छपा। यह लेख साम्प्रदायिकता की समस्या पर शहीद भगतसिंह और उनके साथियों के विचारों का सार है।

भारत वर्ष की दशा इस समय बड़ी दयनीय है। एक धर्म के अनुयायी दूसरे धर्म के अनुयायियों के जानी दुश्मन हैं। अब तो एक धर्म का होना ही दूसरे धर्म का कट्टर शत्रु होना है। यदि इस बात का अभी यकीन न हो तो लाहौर के ताजा दंगे ही देख लें। किस प्रकार मुसलमानों ने निर्दोष सिखों, हिन्दुओं को मारा है और किस प्रकार सिखों ने भी वश चलते कोई कसर नहीं छोड़ी है। यह मार-काट इसलिए नहीं की गयी कि फलाँ आदमी दोषी है, वरन इसलिए कि फलाँ आदमी हिन्दू है या सिख है या मुसलमान है। बस किसी व्यक्ति का सिख या हिन्दू होना मुसलमानों द्वारा मारे जाने के लिए काफी था और इसी तरह किसी व्यक्ति का मुसलमान होना ही उसकी जान लेने के लिए पर्याप्त तर्क था। जब स्थिति ऐसी हो तो हिन्दुस्तान का ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में हिन्दुस्तान का भविष्य बहुत अन्धकारमय नजर आता है। इन ‘धर्मों’ ने हिन्दुस्तान का बेड़ा गर्क कर दिया है। और अभी पता नहीं कि यह धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे। इन दंगों ने संसार की नजरों में भारत को बदनाम कर दिया है। और हमने देखा है कि इस अन्धविश्वास के बहाव में सभी बह जाते हैं। कोई बिरला ही हिन्दू, मुसलमान या सिख होता है, जो अपना दिमाग ठण्डा रखता है, बाकी सब के सब धर्म के यह नामलेवा अपने नामलेवा धर्म के रौब को कायम रखने के लिए डण्डे लाठियाँ, तलवारें-छुरें हाथ में पकड़ लेते हैं और आपस में सर-फोड़-फोड़कर मर जाते हैं। बाकी कुछ तो फाँसी चढ़ जाते हैं और कुछ जेलों में फेंक दिये जाते हैं। इतना रक्तपात होने पर इन ‘धर्मजनों’ पर अंग्रेजी सरकार का डण्डा बरसता है और फिर इनके दिमाग का कीड़ा ठिकाने आ जाता है।
यहाँ तक देखा गया है, इन दंगों के पीछे साम्प्रदायिक नेताओं और अखबारों का हाथ है। इस समय हिन्दुस्तान के नेताओं ने ऐसी लीद की है कि चुप ही भली। वही नेता जिन्होंने भारत को स्वतन्त्रा कराने का बीड़ा अपने सिरों पर उठाया हुआ था और जो ‘समान राष्ट्रीयता’ और ‘स्वराज्य-स्वराज्य’ के दमगजे मारते नहीं थकते थे, वही या तो अपने सिर छिपाये चुपचाप बैठे हैं या इसी धर्मान्धता के बहाव में बह चले हैं। सिर छिपाकर बैठने वालों की संख्या भी क्या कम है? लेकिन ऐसे नेता जो साम्प्रदायिक आन्दोलन में जा मिले हैं, जमीन खोदने से सैकड़ों निकल आते हैं। जो नेता हृदय से सबका भला चाहते हैं, ऐसे बहुत ही कम हैं। और साम्प्रदायिकता की ऐसी प्रबल बाढ़ आयी हुई है कि वे भी इसे रोक नहीं पा रहे। ऐसा लग रहा है कि भारत में नेतृत्व का दिवाला पिट गया है।
दूसरे सज्जन जो साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में विशेष हिस्सा लेते रहे हैं, अखबार वाले हैं। पत्रकारिता का व्यवसाय, किसी समय बहुत ऊँचा समझा जाता था। आज बहुत ही गन्दा हो गया है। यह लोग एक-दूसरे के विरुद्ध बड़े मोटे-मोटे शीर्षक देकर लोगों की भावनाएँ भड़काते हैं और परस्पर सिर फुटौव्वल करवाते हैं। एक-दो जगह ही नहीं, कितनी ही जगहों पर इसलिए दंगे हुए हैं कि स्थानीय अखबारों ने बड़े उत्तेजनापूर्ण लेख लिखे हैं। ऐसे लेखक बहुत कम है जिनका दिल व दिमाग ऐसे दिनों में भी शान्त रहा हो।
अखबारों का असली कर्त्तव्य शिक्षा देना, लोगों से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, साम्प्रदायिक बनाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा पर विचार कर आंखों से रक्त के आँसू बहने लगते हैं और दिल में सवाल उठता है कि ‘भारत का बनेगा क्या?’
जो लोग असहयोग के दिनों के जोश व उभार को जानते हैं, उन्हें यह स्थिति देख रोना आता है। कहाँ थे वे दिन कि स्वतन्त्राता की झलक सामने दिखाई देती थी और कहाँ आज यह दिन कि स्वराज्य एक सपना मात्रा बन गया है। बस यही तीसरा लाभ है, जो इन दंगों से अत्याचारियों को मिला है। जिसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया था, कि आज गयी, कल गयी वही नौकरशाही आज अपनी जड़ें इतनी मजबूत कर चुकी हैं कि उसे हिलाना कोई मामूली काम नहीं है।
यदि इन साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो हमें इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है। असहयोग के दिनों में नेताओं व पत्राकारों ने ढेरों कुर्बानियाँ दीं। उनकी आर्थिक दशा बिगड़ गयी थी। असहयोग आन्दोलन के धीमा पड़ने पर नेताओं पर अविश्वास-सा हो गया जिससे आजकल के बहुत से साम्प्रदायिक नेताओं के धन्धे चौपट हो गये। विश्व में जो भी काम होता है, उसकी तह में पेट का सवाल जरूर होता है। कार्ल मार्क्स के तीन बड़े सिद्धान्तों में से यह एक मुख्य सिद्धान्त है। इसी सिद्धान्त के कारण ही तबलीग, तनकीम, शुद्धि आदि संगठन शुरू हुए और इसी कारण से आज हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, जो अवर्णनीय है।
बस, सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है दरअसल भारत के आम लोगों की आर्थिक दशा इतनी खराब है कि एक व्यक्ति दूसरे को चवन्नी देकर किसी और को अपमानित करवा सकता है। भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। लेकिन वर्तमान स्थिति में आर्थिक सुधार होेना अत्यन्त कठिन है क्योंकि सरकार विदेशी है और लोगों की स्थिति को सुधरने नहीं देती। इसीलिए लोगों को हाथ धोकर इसके पीछे पड़ जाना चाहिये और जब तक सरकार बदल न जाये, चैन की सांस न लेना चाहिए।
लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की जरूरत है। गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। इसलिए तुम्हें इनके हथकंडों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ न करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वे किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों, अधिकार एक ही हैं। तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेदभाव मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों मंे लेने का प्रयत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा, इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जायेंगी और तुम्हें आर्थिक स्वतन्त्राता मिलेगी।
जो लोग रूस का इतिहास जानते हैं, उन्हें मालूम है कि जार के समय वहाँ भी ऐसी ही स्थितियाँ थीं वहाँ भी कितने ही समुदाय थे जो परस्पर जूत-पतांग करते रहते थे। लेकिन जिस दिन से वहाँ श्रमिक-शासन हुआ है, वहाँ नक्शा ही बदल गया है। अब वहाँ कभी दंगे नहीं हुए। अब वहाँ सभी को ‘इन्सान’ समझा जाता है, ‘धर्मजन’ नहीं। जार के समय लोगों की आर्थिक दशा बहुत ही खराब थी। इसलिए सब दंगे-फसाद होते थे। लेकिन अब रूसियों की आर्थिक दशा सुधर गयी है और उनमें वर्ग-चेतना आ गयी है इसलिए अब वहाँ से कभी किसी दंगे की खबर नहीं आयी।
इन दंगों में वैसे तो बड़े निराशाजनक समाचार सुनने में आते हैं, लेकिन कलकत्ते के दंगों मंे एक बात बहुत खुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के भी यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्गचेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।
यह खुशी का समाचार हमारे कानों को मिला है कि भारत के नवयुवक अब वैसे धर्मों से जो परस्पर लड़ाना व घृणा करना सिखाते हैं, तंग आकर हाथ धो रहे हैं। उनमें इतना खुलापन आ गया है कि वे भारत के लोगों को धर्म की नजर से-हिन्दू, मुसलमान या सिख रूप में नहीं, वरन् सभी को पहले इन्सान समझते हैं, फिर भारतवासी। भारत के युवकों में इन विचारों के पैदा होने से पता चलता है कि भारत का भविष्य सुनहला है। भारतवासियों को इन दंगों आदि को देखकर घबराना नहीं चाहिए। उन्हें यत्न करना चाहिए कि ऐसा वातावरण ही न बने, और दंगे हों ही नहीं।
1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है इसमें दूसरे का कोई दखल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता। इसलिए गदर पार्टी जैसे आन्दोलन एकजुट व एकजान रहे, जिसमें सिख बढ़-चढ़कर फाँसियों पर चढ़े और हिन्दू मुसलमान भी पीछे नहीं रहे।
इस समय कुछ भारतीय नेता भी मैदान में उतरे हैं जो धर्म को राजनीति से अलग करना चाहते हैं। झगड़ा मिटाने का यह भी एक सुन्दर इलाज है और हम इसका समर्थन करते हैं।
यदि धर्म को अलग कर दिया जाये तो राजनीति पर हम सभी इकट्ठे हो सकते है। धर्मों में हम चाहे अलग-अलग ही रहें।
हमारा ख्याल है कि भारत के सच्चे हमदर्द हमारे बताये इलाज पर जरूर विचार करेंगे और भारत का इस समय जो आत्मघात हो रहा है, उससे हमे बचा लेंगे।

आभार : यह फाइल आरोही, ए-2/128, सैक्टर-11, रोहिणी, नई दिल्ली — 110085 द्वारा प्रकाशित संकलन ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ (सम्पादक : राजेश उपाध्याय एवं मुकेश मानस) के मूल फाइल से ली गयी है।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

परसाई और ज्यादा ज़रूरी हो गए हैं समय के साथ



इस लेख में मैं और कुछ नहीं लिखना चाहूँगा सिवाय कि परसाई को पढ़ने और उनके लिखे हुए से जुड़ पाने के अपने अनुभव। हो सकता है कि समय रहे तो इसका भाग दो, तीन वगैरह भी लिखा जाए। मैं ये तो दावा नहीं करूँगा कि मैंने परसाई को पर्याप्त पढ़ लिया है लेकिन जितना पढ़ा है वो भी बहुत सब्स्टेंशिअल है। ये पिछले लेखों की तरह कन्वेंशनल टाइप श्रद्धांजलि लेख बिल्कुल नहीं होना चाहिए- वरना सिद्ध हो जाएगा कि मैंने परसाई को थोड़ा भी नहीं समझा।

शुरुआत में साहित्य पढ़ने वाले बहुत से लोगों की तरह मुझे भी हास्य और व्यंग्य के बीच की सीमा का अंदाज़ा नहीं था। बाद में पता चला कि हास्य सिर्फ़ हँसी भर दे सकता है; व्यंग्य हँसी भी ला सकता है लेकिन हँसी न तो उसका महत्वपूर्ण अंग है और न ही उसका एकमात्र लक्ष्य। और ये बात एकदम स्पष्ट हुई परसाई के व्यंग्य-निबंध पढ़कर।

पहली रचना थी 'वैष्णव की फिसलन'।
वैष्णव करोड़पति है। जायदाद लगी है। भगवान सूदखोरी करते हैं। ब्याज़ से क़र्ज़ देते हैं। वैष्णव दो घण्टे भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, फिर गादी-तकियेवाली बैठक में आकर धर्म को धंधे से जोड़ते हैं। धर्म धंधे से जुड़ जाए, इसी को ‘योग’ कहते हैं।
समाज में उपस्थित छिछले स्तर की धार्मिक प्रवृत्तियों पर कैसा तीखा उपहास है। हमारा स्वार्थ ही हमारा आत्म भी है और हमारा भगवान भी। स्वार्थों के नाते हम किसी भी तरह अपने किए को जस्टिफाई कर सकते हैं। धार्मिक स्वाँग हमें ये भ्रम दिलाये रहता है कि जो भी है सब कुछ भगवान की मर्जी, हमारा उस पर नियंत्रण ही कहाँ !
प्रभु, आपके ही आशीर्वाद से मेरे पास इतना सारा दो नंबर का धन इकठ्ठा हो गया है। अब मैं इसका क्या करूँ? आप ही रास्ता बताइए। मैं इसका क्या करूँ?
खुद को धंधे की आवश्यकता के हिसाब से एडजस्ट कर लेना स्वाभाविक है लेकिन धर्म उसे कैसे रोचक बना रहा है देखिये-
दूसरे दिन वैष्णव साष्टांग विष्णु के सामने लेट गया। 
वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज़ आई- मूर्ख, गांधीजी से बड़ा वैष्णव इस युग में कौन हुआ है? गाँधी का भजन है- ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिये, जे पीर पराई जाणे रे।’ तू इन होटलों में रहनेवालों की पीर क्यों नहीं जानता? उन्हें इच्छानुसार खाना नहीं मिलता। इनकी पीर तू समझ और उस पीर को दूर कर।
वैष्णव समझ गया।उसने जल्दी ही गोश्त, मुर्गा, मछली का इंतज़ाम करवा दिया।
 इस तरह पहले गोश्त फिर उसको पचाने की दवा यानी शराब और फिर ज़िंदा गोश्त यानी कैबरे का नंगा नाच भी बिज़नेस ऑन-डिमांड की तर्ज पर शुरू हो जाता है। और फिर-
कृपानिधान ! ग्राहक लोग नारी माँगते हैं – पाप की खान। मैं तो इस पाप की खान से जहाँ तक बनता है, दूर रहता हूँ। अब मैं क्या करूँ?
वैष्णव की शुद्ध आत्मा से आवाज़ आई– मूर्ख, यह तो प्रकृति और पुरुष का संयोग है। इसमें क्या पाप और क्या पुण्य? चलने दे।
परसाई के व्यंग्य निबंधों का उपसंहार पक्ष सबसे तीक्ष्ण होता है। ये उपसंहार देखिये-
अब वैष्णव का होटल खूब चलने लगा। शराब, गोश्त, कैबरे और औरत। वैष्णव धर्म बराबर निभा रहा है। इधर यह भी चल रहा है।
वैष्णव ने धर्म को धंधे से खूब जोड़ा है।
परसाई ने अपने समकालीन राजनीतिक सामाजिक परिवेश पर भी उतने ही करारे व्यंग्य किए हैं जबकि आम तौर पर लिखने वाले अपने समकालीन की सीधी आलोचना से बचते रहे हैं और व्यंग्य सीधे न होकर इनडाइरेक्ट बात रखते हैं। परसाई सीधे भी कहते हैं और तीखा भी कहते हैं।
संघ का विज्ञानं अलग है जैसे उसका इतिहास अलग है। डॉक्टर और वैज्ञानिक खून के टाइप बताते है। मगर संघ मानता है - इन टाइप्स के अलावा एक टाइप "हिन्दू" खून भी होता है।
संघवाले मानते है कि हिन्दू पूर्वजो ने अंतरिक्ष यान बनाया था। अचरज इसी बात का है कि अंतरिक्ष यान बनाने वालो ने साइकिल क्यों न बना ली।
या फिर ये -
मेरे भाषण का विषय था- आजादी के पच्चीस वर्ष। सामने लडकियां बैठी थीं, जिनकी शादी बिना दहेज़ के नहीं होने वाली थी। बैल की तरह मार्केट में उनके लिए पति खरीदना ही होगा। स्त्री के लिए अब भी पत्नी के पद पर नौकरी करना सबसे सुरक्षित जीविका है।…
और लड़के बैठे थे, जिन्हें डिग्री लेने के बाद सिर्फ़ सिनेमाघर पर पत्थर फेंकने का काम मिलने वाला है।… 
महात्मा गाँधी मार्ग पर ठग बैठते हैं। रवीन्द्र मार्ग पर बूचड़खाने खुले हैं| परीक्षा में कोई बैठता है, और पास दूसरा हो जाता है। सहकारी दूकान के सामने कतार लगी है और पीछें के दरवाजे से चीजें कालाबाजार में जा रही हैं। हम किसी को भ्रष्टाचारी घोषित करते हैं और वो सदाचार-अधिकारी बना दिया जाता है।…
आज़ादी के पच्चीस वर्षों का यही हिसाब है।

लेकिन उनकी इस शैली से अलग एक निबंध है 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे'। उसका ये अंश पढ़िए -
राजनैतिक पार्टियां  प्रचार कार्य में लगी हैं ।
पार्टी नं. १ कहती है- हम जनता को वचन देते हैं की हम सत्ता में आते ही खेती बंद करा देंगे । अन्न ही नहीं पैदा होगा तो जनता भूखी रहेगी ही।
जनता कहती है- नहीं, अन्न तो खूब पैदा होना चाहिए। फिर भी हमें भूखा रहने देना चाहिए। अन्न ही नहीं पैदा होगा तो हमारा राष्ट्रीय गौरव नष्ट हो जाएगा।
 पार्टी नं. २ वादा करती है- हम अन्न तो पैदा होने देंगे, पर उसे इतना महँगा कर देंगे कि लोग खा नहीं सकेंगे। 
 जनता कहती है- ये खेल हम बहुत देख चुके। हम नए ढंग से भूखे मरना चाहते हैं।
 पार्टी नं. ३ मंच पर आती है। कहती है- हम अन्न की पैदावार खूब बढ़ाएँगे, पर साथ ही चूहों का भी सघन उत्पादन होगा। जनता को अन्न-उत्पादन का गौरव भी मिलेगा और भूखा मरने का सुख भी। 
 जनता कहती है- ये पार्टी हमें पसंद है। इसी की सरकार बनेगी। हम बाहुल्य में भूखा मरना चाहते हैं। …
 सरकार बन जाती है। फसल चूहे खाते जाते हैं और आदमी ख़ुशी ख़ुशी मरते जाते है। एक साल अकाल पड़ जाता है। चूहे सरकार को घेरते हैं ('जनता नहीं') कि उनकी ओवरईटिंग की आदत पड़ गयी है और उनका पेट भरा जाए।
चूहे बेताब हैं। वे भूख से तिलमिला रहे हैं। … चूहे दाँत किटकिटाकर भिड़ जाते हैं।
पहले चूहे संविधान कुतरकर खा जाते हैं। फिर चूहे सरकार खा जाते हैं, संसद खा जाते हैं, न्यायपालिका को खा जाते हैं।
मेरी नींद खुल जाती है। संवैधानिक बहस करने वाले मुझे याद आते हैं। फिर याद आता है, रिक्शेवाला।
क्या अर्थ है, इस सपने का ? पता नहीं ।
लेकिन हम जानते हैं कि इसके क्या मतलब हैं और परसाई के समय से आगे आकर ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर हम ये भी जान पा रहे हैं कि इन चूहों को कौन पाल रहा है और ये भी कि इंसान अब भी जाग नहीं रहा। वो बस ख़ुशी से मर रहा है- किसी भुलावे में, किसी राजनैतिक छलावे में। और इसी वज़ह परसाई और ज्यादा आवश्यक होते जा रहे हैं समय के साथ। …



रविवार, 17 अगस्त 2014

अमृतलाल नागर जो कभी नहीं मरे

" प्रेमचंद के उत्तराधिकारी के तौर पर टैग किया जाना कुछ हद तक उनकी क्षमताओं को एक दायरे में सीमित मान लेने जैसा है जबकि वो उस दायरे से कहीं ज्यादा बड़ी परिधि खींचते हैं। "






अमृतलाल नागर ने बहुत कुछ लिखा। अगर हम श्रेणियों में बांटें यानि क्लासिफाई करें तो उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, जीवनी, नाटक, रेडियो नाटक, रिपोर्ताज, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि गद्य में लगभग सब कुछ लिखा। और सिर्फ़ साहित्य नहीं बल्कि सिनेमा में भी उन्होंने महत्वपूर्ण फिल्मों के संवाद और पटकथा ( डायलॉग और स्क्रीनप्ले ) लिखे, जैसे कल्पना (१९४६), संगम (१९४१), और बहूरानी (१९४१)। साहित्य अकादमी, प्रेमचंद पुरस्कार, और सोवियत संघ नेहरू पुरस्कार आदि से उनके लेखन को सम्मानित किया गया है।
अपने समय के बहुत से अन्य लेखकों की तरह ही उनके लेखन में भी प्रमुख विषय वही हैं - सामाजिक बंधनों के प्रति विद्रोह, प्रशासकों के द्वारा उत्पीड़न, ज़मींदारों-व्यापारियों द्वारा जनता का शोषण, साम्प्रदायिकतावादियों की कुटिल चालें आदि। लेकिन उनका कला तत्त्व अन्य सभी लेखकों के कला तत्त्व से अलग दिखाई देता है। 

मैंने उनकी पहली बार जो कहानी पढ़ी थी वो थी 'प्रायश्चित '। यक़ीनन आप में से भी बहुतों ने पढ़ी होगी और उसके कथ्य को समझा भी होगा। समाज के व्यर्थ स्टीरियोटाइप को भंग करती ये कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी कि उनके समय में थी। विशेष तौर पर नारी के प्रति जिस मध्यकालीन (feudal) सोच को हम अभी भी अपने समाज में पनपा रहे हैं ये कहानी उसको तहस-नहश कर देती है। जिन्होंने नहीं पढ़ी वो जरूर पढ़ें और मुझे लगता है जिन्होंने पढ़ रखी है वो भी एक बार फ़िर से पढ़ना चाहेंगे। ये रही कहानी -

प्रायश्चित 

 

जीवन वाटिका का वसंत, विचारों का अंधड़, भूलों का पर्वत, और ठोकरों का समूह है यौवन। इसी अवस्था में मनुष्य त्यागी, सदाचारी, देश भक्त एवं समाज-भक्त भी बनते हैं, तथा अपने ख़ून के जोश में वह काम कर दिखाते हैं, जिससे कि उनका नाम संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिख दिया जाता है, तथा इसी आयु में मनुष्य विलासी, लोलुपी और व्यभिचारी भी बन जाता है, और इस प्रकार अपने जीवन को दो कौड़ी का बनाकर पतन के खड्ड में गिर जाता है, अंत में पछताता है, प्रायश्चित करता है, परंतु प्रत्यंचा से निकाला हुआ बाण फिर वापस नहीं लौटता, खोई हुई सच्ची शांति फिर कहीं नहीं मिलती।



मणिधर सुन्दर युवक था। उसके (जेब) पर्स में पैसा था और पास में था नवीन उमंगों से पूरित हृदय। वह भोला-भाला सुशील युवक था। बेचारा सीधे मार्ग पर जा रहा था, यारों ने भटका दिया—दीन को पथ-हीन कर दिया। उसे नित्य-प्रति कोठों की सैर कराई, नई-नई परियों की बाकीं झाकी दिखाई। उसके उच्चविचारों का उसकी महत्वकाक्षांओं का अत्यन्त निर्दयता के साथ गला घोंट डाला गया। बनावटी रूप के बाज़ार ने बेचारे मणिधर को भरमा दिया। पिता से पैसा मांगता था वह, अनाथालयों में चन्दा देने के बहाने और उसे आंखें बंद कर बहाता था, गंदी नालियों में, पाप की सरिता में, घृणित वेश्यालयों में।



ऐसी निराली थी उसकी लीला। पंडित जी वृद्ध थे। अनेक कन्याओं के शिक्षक थे। वात्सल्य प्रेम के अवतार थे। किसी भी बालिका के घर खाली हाथ न जाते थे। मिठाई, फल, किताब, नोटबुक आदि कुछ न कुछ ले कर ही जाते थे तथा नित्यप्रति पाठ सुनकर प्रत्येक को पारितोषिक प्रदान करते थे। बालिकाएं भी उनसे अत्यन्त हिल-मिल गई थीं। उनके संरक्षक गण भी पंडित जी की वात्सल्यता देख गद्गद्ग हो जाते थे। घरवालों के बाद पंडित जी ही अपनी छात्राओं के निरीक्षक थे, संरक्षक थे। बालिकाएं इनके घर जातीं, हारमोनियम बजातीं, गातीं, हंसतीं, खेलती, कूदतीं थीं। पंडितजी इससे गद्गद्ग हो जाते थे तथा बाहरवालों से प्रेमाश्रु ढरकाते हुआ कहा करते, ‘‘इन्हीं लड़कियों के कारण मेरा बुढ़ापा कटता चला जा रहा है। अन्यथा अकेले तो इस संसार में मेरा एक दिवस भी काटना भारी पड़ जाता।’’ समस्त संसार पंडितजी की एक मुंह से प्रशंसा करता था।



बाहरवालों को इस प्रकार ठाट दिखाकर पंडितजी दूसरे ही प्रकार का खेल खेला करते थे। वह अपनी नवयौवना सुन्दर छात्राओं को अन्य विषयों के साथ-साथ प्रेम का पाठ भी पढ़ाया करते थे, परन्तु वह प्रेम, विशुद्ध प्रेम नहीं, वरन प्रेम की आड़ में भोगलिप्सा की शिक्षा थी, सतीत्व विक्रय का पाठ था। काम-वासना का पाठ पढ़ाकर भोली-भाली बालिकाओं का जीवन नष्ट कराकर दलाली खाने की चाल थी, टट्टी की आड़ में शिकार खेला जाता था। पंडित जी के आस-पास युनिवर्सिटी तथा कालेज के छात्र इस प्रकार भिनभिनाया करते थे, जिस प्रकार कि गुड़ के आस पास मक्खियां। विचित्र थे पंडितजी और अद्भुत् थी उनकी माया।



रायबहादुर डा. शंकरलाल अग्निहोत्री का स्थान समाज में बहुत ऊंचा था। सभा-सोसाइटी के हाकिम-हुक्काम में आदर की दृष्टि से देखे जाते थे वह। उनके थी एक कन्या –मुक्ता। वह हजारों में एक थी—सुन्दरता और सुशीलता दोनों में। दुर्भाग्यवश वृद्ध पंडितजी उसे पढ़ाने के लिए नियुक्त किए गए। भोली-भाली बालिका अपने आदर्श को भूलने लगी। पंडित जी ने उसके निर्मल हृदय में अपने कुत्सित महामंत्र का बीजारोपण कर दिया था। अन्य युवती छात्राओं की भांति मुक्ता भी पंडित जी के यहां ‘हारमोनियम’ सीखने जाने लगी।



पंडितजी मुक्ता के रूप लावण्य को किराये पर उठाने के लिए कोई मनचला पैसे वाला ढूंढ़ने लगे। अंत में मणिधर को आपने अपना पात्र चुन लिया। नई-नई कलियों की खोज में भटकने वाला मिलिन्द इस अपूर्व कली का मदपान करने के लिए आकुलित हो उठा। इस अवसर पर पंडितजी की मुट्ठी गर्म हो गई। दूसरे ही दिवस मणिधर को पंडित जी के यहां जाना था। वह संध्या अत्यन्त ही रमणीक थी। मणि ने उसे बड़ी प्रतीक्षा करने के पश्चात पाया था। आज वह अत्यन्त प्रसन्न था। आज उसे पंडितजी के यहां जाना था।...वह लम्बे-लम्बे पग रखता हुआ चला जा रहा था पंडितजी के पापालय की ओर। आज उसे रुपयों की वेदी पर वासना-देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ानी थी।



मुक्ता पंडितजी के यहां बैठी हारमोनियम पर उंगलियां नचा रही थी, और पंडितजी उसे पुलकित नेत्रों से निहार रहे थे। वह बाजा बजाने में व्यस्त थी। साहसा मणिधर के आ जाने से हारमोनियम बंद हो गया। लजीली मुक्ता कुर्सी छोड़कर एक ओर खड़ी हो गई। पंडितजी ने कितना ही समझाया, ‘‘बेटी ! इनसे लज्जा न कर, यह तो अपने ही हैं। जा, बजा, बाजा बजा। अभ्यागत सज्जन के स्वागत में एक गीत गा।’’ परन्तु मुक्ता को अभी लज्जा ने न छोड़ा था। वह अपने स्थान पर अविचल खड़ी थी, उसके सुकोमल मनोहारी गाल लज्जावश ‘अंगूरी’ की भांति लाल हो रहे थे, अलकें आ-आकर उसका एक मधुर चुम्बन लेने की चेष्टा कर रही थीं। मणिधर उस पर मर मिटा था। वह उस समय बाह्य संसार में नहीं रह गया था। यह सब देख पंडितजी खिसक गए। अब उस प्रकोष्ठ में केवल दो ही थे।



मणिधर ने मुक्ता का हाथ पकड़कर कहा, ‘‘आइए, खड़ी क्यों हैं। मेरे समीप बैठ जाइए।’’ मणिधर धृष्ट होता चला जा रहा था। मुक्ता झिझक रही थी, परन्तु फिर भी मौन थी। मणिधर ने कहा—‘‘क्या पंडितजी ने इस प्रकार आतिथ्य सत्कार करना सिखलाया है कि घर पर कोई पाहुन आवे और घरवाला चुपचाप खड़ा रहे...शुभे, मेरे समीप बैठ जाइये।’’ प्रेम की विद्युत कला दोनों के शरीर में प्रवेश कर चुकी थी। मुक्ता इस बार कुछ न बोली। वह मंत्र-मुग्ध-सी मणि के पीछे-पीछे चली आई तथा उससे कुछ हटकर पलंग पर बैठ गई। ‘‘आपका शुभ नाम ?’’ मणि ने ज़रा मुक्ता के निकट आते हुए कहा। ‘‘मुक्ता।’’ लजीली मुक्ता ने धीमे स्वर में कहा।



बातों का प्रवाह बड़ा, धीरे-धीरे समस्त हिचक जाती रही। और..और !! थोड़ी देर के पश्चात- मुक्ता नीरस हो गई, उसकी आब उतर गई थी।



‘‘हिजाबे नौं उरुमा रहबरे शौहर नबी मानद, अगर मानद शबे-मानद शबे दीगर नबीं मानद।’’



हिचक खुल गई थी। मणि और मुक्ता का प्रेम क्रमशः बढ़ने लगा था। मणि मिलिन्द था, पुष्प पर उसका प्रेम तभी ही ठहर सकता है, जब तक उसमें मद है, परन्तु मुक्ता का प्रेम निर्मल और निष्कलंक था। वह पाप की सरिता को पवित्र प्रेम की गंगा समझकर बेरोक-टोक बहती ही चली जा रही थी। अचानक ठोकर लगी। उसके नेत्र खुल गए। एक दिन उसने तथा समस्त संसार ने देखा कि वह गर्भ से थी।



समाज में हलचल मच गई। शंकरलाल जी की नाक तो कट ही गई। वह किसी को मुँह दिखाने के योग्य न रह गए थे—ऐसा ही लोगों का विचार था। अस्तु। जाति-बिरादरी जुटी, पंच-सरपंच आए। पंचायत का कार्य आरम्भ हुआ। मुक्ता के बयान लिए गए। उसने आंसुओं के बीच सिसकियों साथ-साथ समाज के सामने सम्पूर्ण घटना आद्योपांत सुना डाली— पंडितजी का उसके भोले-भाले स्वच्छ हृदय में काम-वासना का बीजारोपण करना, तत्पश्चात उसका मणिधर से परिचय कराना आदि समस्त घटना उसने सुना डाली। पंडितजी ने गिड़गिड़ाते अपनी सफाई पेश की तथा मुक्ता से अपनी वृद्धावस्था पर तरस खाने की प्रार्थना की। परंतु मणिधर शान्त भाव से बैठा रहा।



पंचों ने सलाह दी। बूढ़ों ने हां में हां मिला दिया। सरपंच महोदय ने अपना निर्णय सुना डाला। सारा दोष मुक्ता के माथे मढ़ा गया। वह जातिच्युत कर दी गई। ‘रायबहादुर के पिता की भी वही राय थी, जो पंचों की थी। मणिधर और पंडितजी को सच्चरित्रता का सर्टिफिकेट दे निर्दोषी करार दे दिया गया। केवल ‘अबला’ मुक्ता ही दुख की धधकती हुई अग्नि में झुलसने के लिए छोड़ दी गई। अन्त में अत्यन्त कातर भाव से निस्सहाय मुक्ता ने सरपंच की दोहाई दी—उसके चरणों में गिर पड़ी। सरपंच घबराए। हाय, भ्रष्टा ने उन्हें स्पर्श कर लिया था। क्रोधित हो उन्होंने उस गर्भिणी, निस्सहाय, आश्रय-हीना युवती को धक्के मार कर निकाल देने की अनुमति दे दी। उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए हिन्दू समाज को वास्तव में पतन के खड्ड में गिराने वाले, नरराक्षस, खुशामदी टट्टू ‘पीर बवर्ची, भिस्ती, खर’ की कहावत को चरितार्थ करने वाले इस कलंक के सच्चे अपराधी पंडितजी तत्क्षण उठे उसे धक्का मारकर निकालने ही वाले थे—अचानक आवाज आई ठहरो।



अन्याय की सीमा भी परिमित होती है। तुम लोगों ने उसका भी उल्लंघन कर डाला है।’’ लोगों ने नेत्र घुमाकर देखा, तो मणिधर उत्तेजित हो निश्चल भाव से खड़ा कह रहा था, ‘‘हिन्दू समाज अन्धा है, अत्याचारी है एवं उसके सर्वेसर्वा अर्थात् हमारे ‘माननीय’ पंचगण अनपढ़ हैं, गंवार हैं, और मूर्ख हैं। जिन्हें खरे एवं खोटे, सत्य और असत्य की परख नहीं वह क्या तो न्याय कर सकते हैं और क्या जाति-उपकार ? इसका वास्तविक अपराधी तो मैं हूं। इसका दण्ड तो मुझे भोगना चाहिए। इस सुशील बाला का सतीत्व तो मैंने नष्ट किया है और मुझसे भी अधिक नीच हैं यह बगुला भगत बना हुआ नीच पंडित। इस दुराचारी ने अपने स्वार्थ के लिए न मालूम कितनी बालाओं का जीवन नष्ट कराया है—उन्हें पथभ्रष्ट कर दिया है। जिस आदरणीय दृष्टि से इस नीच समाज में देखा जाता है वास्तव में यह नीच उसके योग्य नहीं, वरन यह नर पशु है, लोलुपी है, लम्पट है। सिंह की खाल ओढ़े हुए तुच्छ गीदड़ है-रंगा सियार है।’’



सब लोग मणिधर के ओजस्वी मुखमंडल को निहार रहे थे। मणिधर अब मुक्ता को सम्बोधित कर कहने लगा, ‘‘मैंने भी पाप किया है। समाज द्वारा दंडित होने का वास्तविक अधिकारी मैं हूं। मैं भी समाज एवं लक्ष्मी का परित्यग कर तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम्हें सर्वदा अपनी धर्मपत्नी मानता हुआ अपने इस घोर पाप का प्रायश्चित करूंगा। भद्रे, चलो अब इस अन्यायी एवं नीच समाज में एक क्षण भी रहना मुझे पसंद नहीं...चलो।’’ मणिधर मुक्ता का कर पकड़कर एक ओर चल दिया, और जनता जादूगर के अचरज भरे तमाशे की नाई इस दृश्य को देखती रह गयी।
 

(कहानी का टेक्स्ट गद्यकोश वेबसाइट से साभार )

शनिवार, 16 अगस्त 2014

बुकोवस्की की एक कविता

 ( चित्र https://www.facebook.com/pages/Charles-Bukowski-Poetry से साभार )

चार्ल्स बुकोवस्की को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं। हम अगर उनके बारे में लिखने लगें तो हमारे पास शब्दों और क्षमता दोनों की कमी पड़ जाएगी। वैसे महान लोगों और विशेषकर कलाकारों को उनके जन्मदिवस पर और कुल मिलाकर बस जन्मदिवस पर ही याद करने की एक अघोषित परंपरा रही है और इसी को आगे बढ़ाने के लिए मुझे खेद है। लेकिन अच्छा है कि इसी बहाने हम उन्हें याद कर लिया करते हैं। वरना हम फ़ुर्सत भी कहाँ निकाल पाते हैं इस सब लिए !

उनकी एक प्रसिद्ध कविता "Roll The Dice" उनकी स्टाइल को अच्छी तरह से सामने रखती है। और ये एक ऐसी बात हमारे सामने रखती है जिस पर हम ख़ुद भरोसा नहीं करते लेकिन बुकोवस्की के कहने पर ऐसा करने का जी चाहता है। हिंदी अनुवाद का प्रयास किया है, पता नहीं कैसा है। अपनी समझ से किया है, मेरी समझ में बुकोवस्की कम आएं हों तो संवाद और सुधार की पूरी गुंजाइश है।  कविता और उसका अनुवाद ये रहा-

"अग़र कुछ करना है 
तो कर डालो 
वरना शुरू भी मत करना  !

 अग़र कुछ करना है 
तो कर डालो 
भले ही तुमसे छूट जाए
तुम्हारी  प्रेमिका 
या पत्नी 
या नौकरी 
या फ़िर तुम्हारा दिमाग  

लेकिन तुम कर डालो  !


हो सकता है
तुम कुछ खा भी न पाओ 
कई दिनों तक 
सर्दी में ठिठुरते रहो 
बाहर किसी बेंच पर 
जेल भी जाना पड़े शायद 
सहना पड़े  उपहास 
सहने पड़े लोगों  के ताने 
और अकेलापन  । 

अकेलापन एक उपहार है 
और बाकी सब परीक्षा है 
तुम्हारे धैर्य की 
और  तुम्हारे जूनून की  
कि  तुम किस हद तक जाओगे 
ऐसा कर डालने के लिए । 

और तुम कर जाओगे 
लोगों के साथ बिना भी 
तमाम  रुकावटों  के बाद भी 
तुम कर जाओगे  उसे
किसी भी और चीज़ से बेहतर । 

अग़र कुछ सोचा है करने को 
तो  पूरा करना ज़रूर 
उसके जैसा कोई एहसास नहीं । 

और जब तुम  बढ़ जाओगे आगे 
तो पाओगे  अपने चारों तरफ़\
आग से चमकती रात 
लेकिन तुम आगे बढ़ना 
तुम करना, तुम करना , पूरा हासिल करना 
छोड़ना नहीं कहीं बीच में । 

जब  पूरा कर लोगे  वो 
जो सोचा था 
उस  भरपूर ख़ुशी के बीच 
लड़ना होगा तुम्हें 
असली युद्ध ! "


English Original :

"If you’re going to try, go all the way. Otherwise, don’t even start. If you’re going to try, go all the way. 

This could mean losing girlfriends, wives, relatives, jobs and maybe your mind. Go all the way. It could mean not eating for 3 or 4 days. It could mean freezing on a park bench. It could mean jail, it could mean derision, mockery, isolation.

Isolation is the gift, all the others are a test of your endurance, of how much you really want to do it. And you’ll do it despite rejection and the worst odds and it will be better than anything else you can imagine. 

If you’re going to try, go all the way. There is no other feeling like that. You will be alone with the gods and the nights will flame with fire. Do it, do it, do it. Do it. All the way all the way. 

You will ride life straight to perfect laughter, it’s the only good fight there is."

बुधवार, 13 अगस्त 2014

उसके अपहरण की कविता




















(चित्र http://www.topart168.com से साभार ) 

मैं जब भी सोचता हूँ
अपनी सबसे अच्छी शाम के बारे में
वो होती है
मेरे बिस्तर की तरह
पूरी खुली हुई
और मैं दिला रहा होता हूँ
अपने आप को इस बात का भरोसा
कि मेरा शिकंजा ढीला नहीं है|

मैं जब भी सोचता हूँ
अपनी सबसे अच्छी रात के बारे में
पढ़ते हुए मार्केज़ को या फ़िर साहिर को
नींद आकर पसर जाती है  
वो किताब को मुझसे ले जाती है
और फ़िर बंद कर देती है रौशनी का स्विच |

मैं जब भी सोचता हूँ
अपनी सबसे अच्छी सुबह के बारे में
वो उठ चुकी होती है
और मेरी नींद टूटती है
किचन की खटपट से
लेकिन वो सामने होती है
पल्लू कमर में खोसे
मुस्कान के साथ
पैरों तले कुचल गए कीड़े की
बिलबिलाहट-सी मुस्कान के साथ
मेरा ध्यान सिर्फ़ प्याले पर होता है |

मैं जब भी सोचता हूँ
अपने सबसे अच्छे दिन के बारे में
लंचबॉक्स में कोफ्ते होते हैं
अपनी उँगलियों को चाटते समय लेकिन
मुझे उसकी उंगलियाँ नहीं याद आतीं |
ये भी नहीं कि
वो क्या कर रही होगी इस समय
वहाँ
जहाँ मैं उसे रखकर भूल गया
बहुत पहले |

पता नहीं क्यों
आज मन किया
ढूँढने का
उससे बात करने का
और ये सब कुछ
बदल कर लिख डालने का
जैसे
सबसे अच्छी रात में
मैं नींद तोड़कर उठा
और मैंने चूम लिए  
उसके सुस्ताते हुए होंठ |

बस मन किया
लिख लिया
क्या किया ?